नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा सीटों के परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु सरकार के रुख का समर्थन किया है। उन्होंने अगले 25 वर्षों तक सीटों की मौजूदा संख्या को बनाए रखने की मांग की है। चिदंबरम ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी संसद की कुल 543 सीटों और तमिलनाडु की 39 सीटों के आवंटन में कोई बदलाव नहीं चाहती।
इस संबंध में चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि तमिलनाडु विधानसभा और कांग्रेस कार्य समिति द्वारा पारित प्रस्ताव इस साझा रुख को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि लोकसभा की कुल क्षमता 543 सीटों और तमिलनाडु के 39 निर्वाचन क्षेत्रों के आवंटन में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। कांग्रेस पार्टी का मानना है कि सीटों के इस मौजूदा आवंटन को अगले 25 सालों तक यथावत रखा जाना चाहिए। चिदंबरम ने इस बात पर खुशी जताई कि तमिलनाडु में सत्तारूढ़ टीवीके और मुख्य विपक्षी दल डीएमके दोनों इस रुख का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।
जानकारी देते चले कि, यह घटनाक्रम तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2026 पर जताई गई गहरी चिंताओं के ठीक एक दिन बाद सामने आया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक में बोलते हुए मुख्यमंत्री विजय ने चेतावनी दी कि यदि सीटों का पुनर्वितरण मुख्य रूप से आबादी के आधार पर किया जाता है, तो दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व घट सकता है।
चिदंबरम ने किया तमिलनाडु के रुख का समर्थन
पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पोस्ट में तमिलनाडु के इस रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु विधानसभा और कांग्रेस कार्य समिति की ओर से पारित प्रस्ताव एक समान सोच को दर्शाते हैं।
कांग्रेस नेता के मुताबिक पार्टी लोकसभा की कुल 543 सीटों और तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों के मौजूदा आवंटन में कोई बदलाव नहीं चाहती। उन्होंने इस व्यवस्था को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग का समर्थन किया।
चिदंबरम ने तमिलनाडु में इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक समर्थन का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक सत्तारूढ़ टीवीके और मुख्य विपक्षी दल डीएमके दोनों इस रुख का समर्थन कर रहे हैं। इससे परिसीमन का मुद्दा राज्य की राजनीति से आगे बढ़कर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे से जुड़ी बड़ी बहस बनता दिखाई दे रहा है।
तमिलनाडु विधानसभा पहले ही पारित कर चुकी है प्रस्ताव
परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु विधानसभा पहले ही एक विशेष प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इसमें केंद्र से मांग की गई थी कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखी जाए।
राज्य सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों का तर्क है कि संसद में राज्यों का मौजूदा प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं बदला जाना चाहिए। उनका मानना है कि आर्थिक योगदान, मानव विकास, जनसंख्या स्थिरीकरण और अन्य सामाजिक उपलब्धियों को भी व्यापक नीति के संदर्भ में ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इस प्रस्ताव ने तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर राजनीतिक सहमति की एक तस्वीर पेश की है। अब कांग्रेस के समर्थन से इस मांग को राष्ट्रीय राजनीति में भी अतिरिक्त महत्व मिल सकता है।
543 सीटें बनाए रखने की मांग क्यों अहम?
लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बनाए रखने की मांग का सीधा संबंध संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व से है। यदि कुल सीटों की संख्या में बदलाव किए बिना केवल राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तब भी कुछ राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है और कुछ की घट सकती है।
तमिलनाडु का प्रस्ताव इसी संभावित बदलाव को रोकने की दिशा में है। राज्य चाहता है कि वर्तमान सीटों की संख्या और वितरण लंबे समय तक स्थिर रहे। कांग्रेस भी अगले 25 वर्षों तक इस व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में है।
फिलहाल कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से 543 लोकसभा सीटों और तमिलनाडु की 39 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने के पक्ष में अपना रुख सामने रखा है। परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार और अन्य राजनीतिक दल दक्षिणी राज्यों की इन चिंताओं का किस तरह समाधान निकालते हैं। यह बहस केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के संघीय ढांचे, राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नीति के बीच संतुलन से भी जुड़ी हुई है।
