नई दिल्ली स्टीविया एक ऐसा पौधा है जो एक बार लगाने पर पांच साल तक उपज देता है। यह चीनी से करीब 300 गुना ज्यादा मीठा होता है, लेकिन इसमें कैलोरी बिल्कुल नहीं होती। इसकी पत्तियां ही मुख्य उत्पाद हैं, जिन्हें सुखाकर बाजार में बेचा जाता है। डायबिटीज मरीजों के लिए यह चीनी का विकल्प माना जाता है, जिससे हेल्थ इंडस्ट्री में इसकी मांग बढ़ रही है।स्टीविया की बुवाई बीज से नहीं, बल्कि कलमों से की जाती है। करीब 15 सेंटीमीटर लंबी कलमों को काटकर पॉलिथिन की थैलियों में तैयार किया जाता है। जड़ें निकलने के बाद इन्हें खेत में रोपा जाता है। रेतीली मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। बुवाई से पहले खेत की अच्छी सफाई जरूरी है।
इस संबंघ में धर्मबीर कंबोज बताते हैं कि इस फसल को गन्ने के मुकाबले करीब 5 फीसदी कम पानी चाहिए। एक एकड़ में करीब 40 हजार पौधे लगाने पड़ते हैं, जिसकी शुरुआती लागत करीब एक लाख रुपये तक आती है। एक पौधे से करीब 125 रुपये तक की कमाई हो सकती है। गन्ने के मुकाबले स्टीविया से 40 गुना तक ज्यादा कमाई हो सकती है। एक बार रोपाई के बाद अगले पांच साल तक लगातार पत्तियों की उपज मिलती रहती है।विशेषज्ञों के मुताबिक, स्टीविया अभी आम किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है, लेकिन इसकी खेती की तरफ रुझान बढ़ रहा है। बढ़ती डायबिटीज और हेल्थ कॉन्शियस आबादी की वजह से आने वाले समय में इसकी मांग और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
क्या है स्टीविया और क्यों बढ़ रही है इसकी मांग?
स्टीविया एक औषधीय पौधा है, जिसकी पत्तियां प्राकृतिक रूप से अत्यधिक मीठी होती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी मिठास सामान्य चीनी की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक मानी जाती है। खास बात यह है कि इसमें कैलोरी नहीं होती, इसलिए इसे चीनी के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है।
डायबिटीज से पीड़ित लोगों और कम कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। खाद्य एवं पेय उद्योग, हर्बल उत्पाद बनाने वाली कंपनियां तथा हेल्थ फूड सेक्टर में भी स्टीविया का उपयोग बढ़ रहा है।
चलते चलते आखिर में बताते चले कि, स्टीविया की खेती आधुनिक कृषि में उभरते हुए लाभदायक विकल्पों में शामिल मानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत प्राकृतिक मिठास, कम कैलोरी, लंबे समय तक उत्पादन और बढ़ती बाजार मांग है। हालांकि किसी भी व्यावसायिक फसल की तरह इसमें भी सफलता के लिए उचित तकनीक, गुणवत्तापूर्ण पौध, वैज्ञानिक प्रबंधन और मजबूत विपणन व्यवस्था जरूरी है। किसान यदि स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर योजनाबद्ध तरीके से इसकी खेती करें, तो यह फसल भविष्य में आय का एक अच्छा स्रोत बन सकती है।
