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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली।सनातन धर्म में किसी भी शुभ काम की शुरुआत या पूजा-पाठ से पहले स्वास्तिक बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। स्वास्तिक को भगवान गणेश का साक्षात प्रतीक और शुभ-लाभ का स्रोत माना जाता है। घर के मुख्य द्वार, तिजोरी या पूजा की थाली पर स्वास्तिक बनाते समय उसके दोनों ओर दो-दो सीधी खड़ी रेखाएं जरूर खींची जाती हैं। शास्त्रों में इन रेखाओं का गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है।

स्वास्तिक के दाएं और बाएं खींची गई दो-दो रेखाएं एक तरह का सुरक्षा कवच बनाती हैं। ये रेखाएं शुभ ऊर्जा को घर के भीतर ही बांधकर रखती हैं और बाहर की नकारात्मक ताकतों या बुरी नजर को घर में प्रवेश करने से रोकती हैं। स्वास्तिक का मध्य बिंदु भगवान विष्णु का स्थान माना जाता है, जहां से संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा संचालित होती है। दोनों तरफ की सीधी रेखाएं इस केंद्रीय ऊर्जा को संतुलित और स्थिर रखती हैं, जिससे घर-परिवार में मानसिक शांति बनी रहती है।

स्वास्तिक की चार भुजाएं चार वेदों- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अगल-बगल बनी रेखाएं इन वेदों के ज्ञान और अनुशासन की मर्यादा को दर्शाती हैं। यह चिन्ह चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) और चारों युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग) का प्रतीक है। दोनों किनारों की रेखाएं समय और स्थान के चक्र में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती हैं।

हिंदू दर्शन में जीवन के चार मुख्य लक्ष्य यानी पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। स्वास्तिक के साथ खींची गई रेखाएं इंसान को इन्हीं चार पुरुषार्थों का सही संतुलन के साथ पालन करने की प्रेरणा देती हैं। इन रेखाओं के पास ‘शुभ’ और ‘लाभ’ लिखने की भी प्रथा है। ये इस बात का प्रतीक है कि जीवन में जो भी काम शुरू किया जाए, वह सही रास्ते से हो और उसका परिणाम मंगलकारी साबित हो। स्वास्तिक का निर्माण हमेशा शुद्ध भाव, सही दिशा और पूरे नियमों का पालन करते हुए ही करना चाहिए।

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