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वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को और मजबूत करते हुए बुधवार (7 जनवरी 2026) को एक राष्ट्रपति मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए, जिसमें अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और एजेंसियों से बाहर निकालने का आदेश दिया गया है। इस सूची में 31 संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से जुड़ी संस्थाएं और 35 गैर-यूएन संगठन शामिल हैं। व्हाइट हाउस और स्टेट डिपार्टमेंट के अनुसार, ये संगठन अमेरिकी हितों, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और संप्रभुता के खिलाफ काम कर रहे हैं, इनमें अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बर्बादी होती है और ये अक्षम या गलत तरीके से संचालित हैं।

बता दें कि, ट्रंप के इस फैसले में भारत की पहल से बने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) का भी नाम है। ISA को 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने शुरू किया था। इसका मुख्यालय हरियाणा के गुरुग्राम में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी कैंपस में है। ISA का उद्देश्य सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना और सौर ऊर्जा को सस्ता व सुलभ बनाना है। फिलहाल इसके 120 से अधिक सदस्य देश हैं, और भारत इसका अध्यक्ष जबकि फ्रांस सह-अध्यक्ष है। अमेरिका नवंबर 2021 में ISA का 101वां सदस्य बना था, लेकिन अब बाहर हो रहा है।

गौरतलब हैं कि, इससे पहले ट्रंप ने जनवरी 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकलने की घोषणा की थी। WHO से बाहर होने के लिए एक साल का नोटिस पीरियड जरूरी है, इसलिए 22 जनवरी 2026 से अमेरिका WHO का सदस्य नहीं रहेगा। ट्रंप ने पहले भी अपने पहले कार्यकाल में WHO, पेरिस समझौते और यूनेस्को से बाहर निकाला था, लेकिन बाइडेन प्रशासन ने इन्हें वापस जोड़ा था। अब ट्रंप ने इन्हें दोबारा छोड़ दिया है।

बता दें कि, यह फैसला वैश्विक सहयोग पर गहरा असर डाल सकता है। UNFCCC से बाहर होने से अमेरिका COP जैसे जलवायु सम्मेलनों में प्रभावी भागीदारी नहीं कर पाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व की छवि खराब होगी और अन्य देश अमेरिका की जगह भरने की कोशिश करेंगे। फिलहाल, UNFCCC से बाहर होने में एक साल लग सकता है, लेकिन अमेरिका ने प्रभावी रूप से भागीदारी रोक दी है।ट्रंप का यह कदम उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का सबसे बड़ा उदाहरण है, जो बहुपक्षीयता से दूरी बनाकर द्विपक्षीय संबंधों पर जोर देता है। क्या इससे वैश्विक जलवायु प्रयास कमजोर होंगे या अन्य देश मजबूत होंगे? समय बताएगा।

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