नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों तक चले संघर्ष के बाद शुक्रवार को दोनों देश स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टाक रिजॉर्ट में ऐतिहासिक शांति वार्ता के लिए आमने-सामने होंगे। यहां समझौते के क्रियान्वयन और आगे की प्रक्रिया पर चर्चा होगी। यह प्रस्तावित शांति समझौता भारत के लिए बड़ी आर्थिक राहत साबित हो सकता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होते ही पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में गिरावट आ सकती है। इसके साथ ही ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से पेट्रोकेमिकल्स आधारित उत्पाद सस्ते होंगे। इससे सिंथेटिक धागे, रबर, प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल्स की कीमतें कम होने की उम्मीद है। नतीजतन कपड़े, साबुन, डिटर्जेंट, कॉस्मेटिक्स, दवाइयां, टायर और कृषि संबंधी सामान भी सस्ते हो सकते हैं।एलपीजी के लिए भारत 88 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से पर्याप्त मात्रा में गैस उपलब्ध हो सकेगी, जिससे कीमतें स्थिर रहने और सब्सिडी बोझ कम होने में मदद मिलेगी। इसके अलावा डीजल कीमतों में कमी से खेती, कोल्ड स्टोरेज और माल ढुलाई की लागत घटने से फल-सब्जी और खाने-पीने की चीजें भी सस्ती हो सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में आ सकती है गिरावट
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाले बदलाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दौरान तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी रही, जिससे वैश्विक बाजार में कीमतों पर दबाव देखा गया। यदि शांति समझौता सफल होता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल और गैस की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य हो जाती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने की संभावना बढ़ सकती है।
साबुन, डिटर्जेंट और कॉस्मेटिक उत्पाद हो सकते हैं सस्ते
साबुन, डिटर्जेंट, शैंपू, कॉस्मेटिक्स और कई घरेलू उपयोग की वस्तुओं के निर्माण में पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने से इन उत्पादों की उत्पादन लागत घट सकती है।
यदि कंपनियां इस लागत लाभ को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं, तो आने वाले समय में दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में कमी देखने को मिल सकती है। इससे महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा और उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति मजबूत होगी।
दरअसल, भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए इस समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होते ही पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) के दाम में गिरावट देखने को तो मिलेंगे ही। साथ ही इसका असर ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट पर भी दिखेगा।
