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नई दिल्ली।इस साल 2026 में मानसून को लेकर चिंता जताई गई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मई में अपना अनुमान बदलते हुए बताया कि बारिश सामान्य से कम यानी लॉन्ग पीरियड एवरेज का सिर्फ 90 प्रतिशत रह सकती है। कमजोर मानसून आने का खतरा 60 प्रतिशत तक है। जून के शुरुआती दिनों में देश में बारिश सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम दर्ज की गई, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।

कम पानी वाली फसलों का चयन
कम बारिश की स्थिति में किसानों को ऐसी फसलें बोनी चाहिए जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है। बाजरा, ज्वार, मोटे अनाज और मूंगफली जैसी फसलें इस स्थिति में बेहतर विकल्प हैं। ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों जैसे धान की जगह इनका चुनाव करने से पानी की कमी में भी फसल बर्बाद होने का खतरा कम रहता है।

पानी बचत और मिट्टी की देखभाल
पानी के सही प्रबंधन के लिए ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम का उपयोग फायदेमंद है। किसानों को बारिश का पानी तालाब या टैंक में इकट्ठा करके रखना चाहिए। देश में करीब 60 प्रतिशत किसान सीधे मानसून पर निर्भर हैं और लगभग आधी खेती की जमीन में पक्की सिंचाई सुविधा नहीं है। मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए जैविक खाद यानी ऑर्गेनिक कंपोस्ट का इस्तेमाल करें, क्योंकि इससे मिट्टी पानी को अधिक देर तक सोखकर रखती है।कुल मिलाकर सही प्लानिंग, कम पानी वाली फसलों का चुनाव, पानी का संरक्षण, मिट्टी की देखभाल और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से किसान कमजोर मानसून के नुकसान से काफी हद तक उबर सकते हैं।

बारिश पर निर्भर है देश की बड़ी कृषि व्यवस्था

भारत में आज भी लगभग 60 प्रतिशत किसान सीधे मानसून पर निर्भर हैं। देश के बड़े हिस्से में खेती वर्षा आधारित है और लगभग आधी कृषि भूमि पर पक्की सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो बुवाई में देरी, फसल की कमजोर बढ़वार और उत्पादन में कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

कम बारिश का प्रभाव केवल धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दलहन, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए मौसम के अनुसार खेती की रणनीति बदलना समय की जरूरत है।

कम पानी वाली फसलों का करें चयन

विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर मानसून की स्थिति में किसानों को ऐसी फसलें चुननी चाहिए जिन्हें अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता होती है।

इस परिस्थिति में बाजरा, ज्वार, रागी, अन्य मोटे अनाज, मूंगफली तथा कुछ दलहनी फसलें बेहतर विकल्प मानी जाती हैं। ये फसलें सीमित वर्षा में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती हैं और सूखे जैसी परिस्थितियों का बेहतर सामना कर सकती हैं।

इसके विपरीत धान जैसी फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यदि पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी फसलों की बुवाई जोखिम भरी साबित हो सकती है। इसलिए स्थानीय जल उपलब्धता और मौसम पूर्वानुमान को ध्यान में रखकर फसल का चयन करना अधिक लाभदायक रहेगा।

कम बारिश के समय उपलब्ध पानी का सही उपयोग सबसे महत्वपूर्ण होता है। विशेषज्ञ किसानों को खेत और गांव स्तर पर वर्षा जल संरक्षण की व्यवस्था विकसित करने की सलाह देते हैं।बारिश के दौरान प्राप्त पानी को खेत तालाब, छोटे जलाशय, टैंक या अन्य संरचनाओं में संग्रहित किया जा सकता है। बाद में यही पानी सिंचाई के लिए उपयोगी साबित होता है। इससे भूजल पर निर्भरता भी कम होती है और सूखे के समय फसलों को आवश्यक नमी मिलती रहती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून का अर्थ यह नहीं है कि अच्छी खेती संभव नहीं होगी। यदि किसान समय रहते मौसम के अनुसार योजना बनाएं, कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें, जल संरक्षण को अपनाएं, आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग करें और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखें, तो वे संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।बदलते मौसम और जलवायु चुनौतियों के बीच टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना ही भविष्य की खेती का सबसे प्रभावी रास्ता माना जा रहा है। सही निर्णय, वैज्ञानिक सलाह और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किसानों को कमजोर मानसून के बावजूद बेहतर उत्पादन और स्थिर आय की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

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