कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठे विवाद ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख अख्तियार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 12 जनवरी 2026 को सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ईसीआई) को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है। यह मामला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दो राज्यसभा सांसदों डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन की याचिकाओं पर आधारित है, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया में मनमानी और प्रक्रियागत अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है।
टीएमसी का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया में चुनाव आयोग ने वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ईसीआई ने बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को व्हाट्सएप संदेशों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान मौखिक निर्देशों के माध्यम से निर्देश जारी किए हैं, बजाय औपचारिक लिखित आदेशों के। यह प्रक्रिया “एक्स्ट्रा-स्टेट्यूटरी” है, अर्थात कानून से बाहर की।
बता दें कि, यह मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में एसआईआर की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में चुनाव आयोग की शक्तियों, नागरिकता और मतदान के अधिकार जैसे संवैधानिक मुद्दे शामिल हैं। ईसीआई ने अपनी दलील में कहा है कि उसके पास मतदाता सूची के एसआईआर करने की शक्ति और क्षमता है, साथ ही यह संवैधानिक दायित्व है कि कोई विदेशी मतदाता के रूप में पंजीकृत न हो। हालांकि, विपक्षी दलों का कहना है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित है और बड़े पैमाने पर मतदाता विलोपन का कारण बन सकती है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।
जानकारी दे दें कि, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ईसीआई के वकील ने दो सप्ताह का समय मांगा, लेकिन पीठ ने इसे अस्वीकार कर दिया और एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि दोनों याचिकाओं पर एक सामान्य जवाब पर्याप्त होगा। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि दावों और आपत्तियों की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 को बढ़ाया जाए और ईसीआई को व्हाट्सएप या अन्य अनौपचारिक माध्यमों से निर्देश जारी करने से रोका जाए। साथ ही, अब तक जारी ऐसे सभी निर्देशों को अवैध घोषित किया जाए।
ये भी बताते चले कि, यह विवाद भारतीय लोकतंत्र की मजबूती पर भी सवाल उठाता है। मतदाता सूची की शुद्धता आवश्यक है, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैधानिकता का अभाव विश्वास को कमजोर कर सकता है। ईसीआई, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, को ऐसे आरोपों से बचना चाहिए जो उसके निष्पक्षता पर संदेह पैदा करें। टीएमसी के फ्लोर लीडर डेरेक ओ’ब्रायन की याचिका में 101 पेजों में विस्तार से तर्क दिए गए हैं कि ईसीआई ने कानून से बाहर जाकर कार्य किया है।
कुल मिलाकर, यह विवाद दर्शाता है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रियाओं को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना कितना चुनौतीपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। सभी पक्षों को उम्मीद है कि न्यायिक प्रक्रिया से सच्चाई सामने आएगी और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा होगी।
