खेती में ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और कल्टीवेटर जैसी आधुनिक मशीनें आ चुकी हैं, लेकिन ये काफी महंगी होती हैं। कई किसान इन्हें खरीद नहीं पाते या खरीदने के बाद लागत नहीं निकाल पाते। लोन की ईएमआई, ब्याज और मेंटेनेंस का खर्च भी जुड़ जाता है। ये मशीनें साल में कुछ ही दिनों काम आती हैं, इसलिए छोटे और सीमांत किसानों के लिए खरीदना नुकसानदेह साबित हो सकता है। ऐसे में किसान किराए पर मशीन लेकर खेती कर रहे हैं।
इस संबंध में जानकारी दे दें कि, किराए पर मशीनरी लेने का फायदा यह है कि सिर्फ इस्तेमाल के समय का पैसा देना होता है। मशीन खराब होने का डर या पूरे साल संभालने का झंझट नहीं रहता। खेती की तकनीक बदलती रहती है, इसलिए किराए पर लेकर किसान लेटेस्ट मशीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे बची रकम अच्छी क्वालिटी के बीज, खाद और सिंचाई में लगाई जा सकती है, जिससे पैदावार और मुनाफा बढ़ता है।
यहां यह बताते चले कि, सरकार छोटे और सीमांत किसानों तक आधुनिक कृषि यंत्रों की पहुंच आसान बनाने के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर यानी सीएचसी की व्यवस्था कर रही है। हर पंचायत स्तर पर ऐसे सेंटर खोले जा रहे हैं, जहां बुआई से कटाई तक की मशीनें उपलब्ध रहती हैं। इन सेंटरों को बनाने के लिए किसानों, किसान समूहों या एफपीओ को 40 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। किसान तय सरकारी दरों पर ट्रैक्टर, रोटावेटर, रीपर और थ्रेशर जैसी मशीनें किराए पर ले सकते हैं। इससे खेती की लागत घटती है और काम समय पर पूरा होता है।किराए पर मशीन लेने की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए सरकार ने डिजिटल तकनीक अपनाई है। किसान मोबाइल फोन से सरकारी पोर्टल जैसे फार्मेक या अन्य ऐप के जरिए मशीन बुक कर सकते हैं। इससे नजदीकी सेंटर में उपलब्ध मशीन और किराए की जानकारी तुरंत मिल जाती है, जिससे ज्यादा पैसे वसूली नहीं हो सकती। किसान समूह खुद का सेंटर खोलना चाहें तो राज्य कृषि विभाग की वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इस पहल से आधुनिक तकनीक कम दाम में खेत तक पहुंच रही है।
कृषि यंत्र खरीदना हर किसान के लिए क्यों नहीं होता लाभदायक?
आधुनिक कृषि मशीनों की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर या अन्य बड़े उपकरण खरीदने के लिए किसानों को अक्सर बैंक से ऋण लेना पड़ता है। इसके बाद हर महीने ईएमआई, ब्याज और मशीन के रखरखाव का खर्च भी जुड़ जाता है।
छोटे और सीमांत किसानों के पास आमतौर पर सीमित भूमि होती है। ऐसे किसान पूरे साल इन मशीनों का उपयोग नहीं कर पाते। अधिकांश कृषि यंत्र केवल बुआई, जुताई या कटाई के मौसम में कुछ दिनों के लिए ही काम आते हैं। बाकी समय मशीनें खाली पड़ी रहती हैं, जबकि उनकी देखभाल और मरम्मत पर खर्च लगातार बना रहता है। यही वजह है कि कई किसानों के लिए कृषि यंत्र खरीदना आर्थिक रूप से लाभदायक साबित नहीं होता।
सरकार कैसे कर रही है किसानों की मदद?
केंद्र और राज्य सरकारें कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि छोटे और सीमांत किसानों को आधुनिक कृषि मशीनें आसानी से उपलब्ध हो सकें।
इन केंद्रों पर खेती के लगभग सभी प्रमुख कार्यों के लिए आवश्यक मशीनें उपलब्ध रहती हैं। किसान अपनी आवश्यकता के अनुसार तय किराये पर ट्रैक्टर, रोटावेटर, रीपर, थ्रेशर, कल्टीवेटर और अन्य उपकरण लेकर समय पर खेती का काम पूरा कर सकते हैं।
आज के समय में कृषि यंत्रीकरण खेती की उत्पादकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। हालांकि हर किसान के लिए महंगे कृषि यंत्र खरीदना संभव या लाभदायक नहीं होता। ऐसे में कस्टम हायरिंग सेंटर और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों के लिए व्यवहारिक और किफायती समाधान प्रदान कर रहे हैं।
