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देहरादून/मंडी। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में मानसून का कहर एक बार फिर लोगों पर भारी पड़ा। सोमवार देर रात उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में सहस्त्रधारा क्षेत्र में बादल फटने से हालात बिगड़ गए। वहीं, हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में भारी बारिश और लैंडस्लाइड की घटनाओं ने कई परिवारों को संकट में डाल दिया। इन आपदाओं ने एक बार फिर पर्वतीय राज्यों में मानसून सीजन की भयावहता को सामने ला दिया है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी के धर्मपुर बस स्टैंड में भी रात में हुई बारिश के बाद मलबा भर गया। बाढ़ में कई बसें दूर तक बह गईं। राज्य में 3 नेशनल हाईवे बंद हैं। 493 सड़कों पर आवाजाही ठप है।

मंडी के ही निहरी में लैंडस्लाइड के कारण 3 की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक पास की एक चट्टान का मलबा एक घर पर गिर गया, जिससे वह ढह गया। इसमें एक ही परिवार के 5 लोग मलबे में दब गए।

स्कूल बंद, अलर्ट जारी

देहरादून प्रशासन ने हालात की गंभीरता को देखते हुए शहर में 12वीं कक्षा तक के सभी स्कूल बंद रखने का आदेश जारी किया। जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग की टीमों को राहत और बचाव कार्य में लगाया गया है।

लोगों की पीड़ा और प्रशासन की चुनौती

देहरादून और मंडी की तस्वीरें देखकर साफ है कि मानसून में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लोग हर साल भय और चिंता के साये में जीते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे हर बार बारिश आते ही जान-माल की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहते हैं।
प्रशासन के लिए यह बड़ी चुनौती है कि कैसे राहत कार्यों को तेज किया जाए और भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचाव की ठोस रणनीति बनाई जाए।

सहस्त्रधारा और टपकेश्वर मंदिर, देहरादून के प्रमुख पर्यटन और धार्मिक स्थल हैं। बादल फटने से इन स्थलों को भारी नुकसान पहुंचा है। स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों का कहना है कि इससे उनका आजीविका स्रोत भी प्रभावित हुआ है।
इसी तरह हिमाचल में मंडी-धर्मपुर क्षेत्र पर्यटन और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहां भी सड़क बंद होने और बसें बहने से परिवहन व पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

देहरादून का बादल फटना और हिमाचल का लैंडस्लाइड, दोनों घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि प्राकृतिक आपदाएं अब और ज्यादा खतरनाक रूप ले रही हैं। ऐसे में जरूरत है कि सरकार, प्रशासन और आम लोग मिलकर आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करें। केवल आपातकालीन राहत ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक उपाय जैसे— वनों का संरक्षण, योजनाबद्ध निर्माण, और संवेदनशील क्षेत्रों में चेतावनी तंत्र को बेहतर बनाना—ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम कर सकते हैं।

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