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नई दिल्ली।किसानों के सच्चे मित्र कहे जाने वाले केंचुए खेतों में कम हो रहे हैं। यह मिट्टी की सेहत बिगड़ने का बड़ा संकेत है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, केंचुओं की कमी मुख्य रूप से जैविक कार्बन की भारी कमी के कारण होती है।केंचुए सड़ी-गली पत्तियों, गोबर की खाद और फसल अवशेषों को खाकर जीवित रहते हैं। इनसे मिट्टी में जैविक कार्बन बनता है। रासायनिक खादों के अधिक उपयोग और जैविक खाद डालने में कमी से जैविक कार्बन का स्तर गिर जाता है। स्वस्थ मिट्टी में यह 0.5 से 0.75 प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह 0.2 प्रतिशत रह गया है। ऐसे में केंचुए मर जाते हैं या गहराई में चले जाते हैं।

हम आपको यहां यह बता दें कि, केंचुओं की वापसी से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की विविधता बढ़ती है। यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण होता है क्योंकि स्वस्थ मिट्टी में लाभकारी कीटों की संख्या बढ़ती है। पानी की बचत होती है और सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है। कुल मिलाकर खेती की लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है।

वही, केंचुओं के घटने के अन्य कारणों में कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल शामिल है, जो मिट्टी में मिलकर उनके लिए जहर बन जाता है। बार-बार गहरी जुताई से उनके बिल नष्ट हो जाते हैं और कई केंचुए कटकर मर जाते हैं। फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है, जिससे केंचुए नष्ट हो जाते हैं।केंचुओं को बढ़ावा देने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करें। गोबर की खाद, वर्मीकंपोस्ट और हरी खाद का उपयोग बढ़ाएं। फसल अवशेषों को खेत में फैलाएं और जरूरत से ज्यादा जुताई से बचें।

अंत में बताते चले कि, केंचुओं की रक्षा करना सिर्फ मिट्टी बचाने का नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि संरक्षित करने का भी विषय है। छोटे-छोटे बदलाव जैसे अवशेष प्रबंधन, कम जुताई और जैविक खाद का उपयोग बड़े परिणाम दे सकते हैं।हर किसान को अपनी मिट्टी की देखभाल करनी चाहिए। केंचुओं की संख्या बढ़ाने के प्रयास से न सिर्फ खेत की उत्पादकता बढ़ेगी बल्कि पर्यावरण भी स्वस्थ रहेगा। सतत खेती की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। समय रहते इन उपायों को अपनाकर किसान अपनी उपज और आय दोनों बढ़ा सकते हैं।

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