नई दिल्ली। जून महीना खत्म होने को है, लेकिन देश में मॉनसून बेहद कमजोर रहा है। 21 जून 2026 तक देशभर में औसतन केवल 46 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य रूप से इस समय तक 84.4 मिलीमीटर बारिश हो जाती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार यह 46 प्रतिशत की कमी है।
यह देश के 126 साल के रिकॉर्ड में दूसरा सबसे सूखा जून है। मॉनसून की इस कमजोर शुरुआत से खेती, जल स्रोतों और किसानों के लिए आने वाले महीनों में चुनौतियां बढ़ गई हैं।मौजूदा स्थिति के लिए मुख्य रूप से प्रशांत महासागर में अल-नीनो को जिम्मेदार माना जा रहा है। अल-नीनो तब होता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में सतही पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे भारत में बारिश कम हो जाती है। यह अल-नीनो आगे और मजबूत होने की उम्मीद है।
इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) फिलहाल न्यूट्रल स्थिति में है, जो बारिश को कोई सहारा नहीं दे रहा। मेडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) भी साथ नहीं दे रहा है। इन सबके कारण नमी वाली हवाएं कमजोर पड़ गई हैं, खासकर मध्य भारत में।IMD के अनुसार जून के आखिरी सप्ताह में स्थिति सुधरने की उम्मीद है, क्योंकि सोमाली जेट मजबूत होने वाला है। हालांकि, पूरे सीजन के लिए अभी चिंता बनी हुई है।
अल नीनो बना कमजोर मॉनसून की बड़ी वजह
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार कमजोर मॉनसून के पीछे सबसे बड़ा कारण अल नीनो (El Niño) की सक्रियता है। अल नीनो एक वैश्विक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का सतही समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है।
जब समुद्र का तापमान बढ़ता है तो वैश्विक स्तर पर हवा और नमी के प्रवाह में बदलाव आता है। इसका असर भारतीय मॉनसून पर भी पड़ता है और सामान्य परिस्थितियों की तुलना में वर्षा कम हो सकती है। भारत के मौसम इतिहास में कई ऐसे वर्ष रहे हैं, जब मजबूत अल नीनो के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई और कई राज्यों को सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा अल नीनो आगे और मजबूत हो सकता है, जिससे पूरे मॉनसून सीजन के दौरान वर्षा का वितरण प्रभावित रहने की आशंका बनी हुई है।
खेती और किसानों के सामने बढ़ी चिंता
जून और जुलाई का समय खरीफ फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, दालें और अन्य खरीफ फसलें समय पर होने वाली वर्षा पर काफी हद तक निर्भर करती हैं।
यदि वर्षा में लगातार कमी बनी रहती है तो किसानों को बुवाई में देरी करनी पड़ सकती है। कई क्षेत्रों में पहले से बोई गई फसलों के अंकुरण और शुरुआती विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सिंचाई सुविधाओं की सीमित उपलब्धता वाले क्षेत्रों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
इसके अलावा कम बारिश का असर जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर पर भी पड़ सकता है। यदि मॉनसून का प्रदर्शन पूरे सीजन में कमजोर रहता है तो आगे चलकर पेयजल आपूर्ति और सिंचाई व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
फिलहाल मौसम विभाग लगातार समुद्री तापमान, वायुमंडलीय गतिविधियों और वैश्विक जलवायु संकेतकों की निगरानी कर रहा है। किसानों और संबंधित एजेंसियों को भी मौसम के ताजा पूर्वानुमानों पर नजर रखने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि संबंधी निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है।
देश में मॉनसून केवल मौसम का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में जून की कमजोर शुरुआत ने चिंताएं जरूर बढ़ाई हैं, लेकिन अब सभी की निगाहें जुलाई की बारिश और मॉनसून की आगामी प्रगति पर टिकी हुई हैं।
