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नई दिल्ली। मध्य पूर्व की जंग और बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच यूरोपीय देश एक नया सुरक्षा ढांचा तैयार कर रहे हैं। इसे अनौपचारिक तौर पर ‘यूरोपियन NATO’ कहा जा रहा है। इस योजना में अमेरिका को जानबूझकर अलग रखा गया है।ब्रिटेन और फ्रांस इस पहल की अगुवाई कर रहे हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस हफ्ते 40 से ज्यादा देशों की बैठक बुलाने जा रहे हैं। बैठक में होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा पर चर्चा होगी, जहां दुनिया का बड़ा तेल सप्लाई रूट है। हालिया युद्ध, मिसाइल हमलों और समुद्री खतरों से शिपिंग प्रभावित हुई है।

प्रस्ताव के तहत एक बहुराष्ट्रीय रक्षा गठबंधन बनाया जाएगा, जो समुद्री जहाजों की सुरक्षा, माइन हटाने और निगरानी का काम करेगा। यह व्यवस्था यूरोपीय कमांड के तहत चलेगी। योजना के मुख्य लक्ष्य हैं- युद्ध में फंसे जहाजों को निकालना, समुद्र में बिछाई बारूदी सुरंगें हटाना और भविष्य में जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करना।

यह कदम यूरोप की आत्मनिर्भर सुरक्षा दिशा की ओर है। कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका के ईरान संबंधी सैन्य अभियानों का समर्थन करने से इनकार कर दिया है। जर्मनी जैसे देश अब इस पहल का समर्थन कर रहे हैं। पहले रेड सी में ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स’ के तहत यूरोप ने स्वतंत्र रूप से जहाजों की सुरक्षा की थी।

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