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समाचार मिर्ची

भोपाल में एक अनोखा चमत्कार हुआ। स्कूटी को टक्कर मारी बोलेरो ने, एफआईआर हुई किसी कुलदीप सिसोदिया पर, और जेल भेज दिए गए पत्रकार कुलदीप सिंगोरिया! अब यह मत पूछिए कि ऐसा कैसे हुआ, क्योंकि पुलिस विभाग विज्ञान और तर्क से परे है। उसकी अपनी एक अलग दुनिया है, जहाँ आरोप और गिरफ्तारी के बीच उतना ही संबंध होता है जितना संसद और जनता के मुद्दों के बीच।

पत्रकार बेचारा क्या करे? अब धरने पर बैठा है। थाने के बाहर प्रदर्शन कर रहा है, चक्काजाम कर रहा है। लेकिन जो नेता हर साल होली-दीवाली पर पत्रकारों को बुलाकर मिठाइयों की थाली में लोकतंत्र पर लेक्चर परोसते थे, वे सब नदारद रहे ( वैसे मैं इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक नहीं हूं, मेरा मानना है दूरी अच्छी है) ख़ैर, वो ढूंढे नहीं मिले जो हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहते थे, “हम पत्रकारों का बहुत सम्मान करते हैं!”दरअसल, उनका ‘सम्मान’ सिर्फ उसी पत्रकार के लिए होता है जो सरकारी प्रेस नोट को हूबहू पढ़कर खबर बना दे, सवाल न पूछे, जवाब की उम्मीद न करे और समय-समय पर उनके चमकते चेहरे की तस्वीरें छापता रहे।

पत्रकार सिंगोरिया को पुलिस ने फोन किया, वो खुद चलकर थाने गए, यह सोचकर कि शायद कोई औपचारिकता होगी। लेकिन औपचारिकता की जगह उन्हें औपचारिक रूप से अंदर कर दिया गया! बेचारे को यह नहीं पता था कि थाने में सत्य और तथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘तंत्र’ होता है।

अब प्रशासन कह रहा है—”जांच होगी!” अरे वाह! जबरदस्ती उठाकर जेल में डाल दिया और अब जांच होगी? यह वैसा ही है जैसे पहले किसी को पीटकर पूछो—”भाईसाहब, बताइए, गलती किसकी थी?”

और कमाल देखिए, पत्रकारों के विरोध के बाद थाना प्रभारी को लाइन अटैच कर दिया गया। ऐसा लगा जैसे असली दोषी यही था! जैसे समस्या यह नहीं कि गलत आदमी जेल गया, बल्कि समस्या यह थी कि कार्रवाई का नाटक समय पर शुरू नहीं हुआ!

इधर विपक्ष भी जाग गया। कमलनाथ जी ने सोशल मीडिया पर वीडियो डाल दिया, ट्वीट कर दिया, बयान दे दिया—माने पूरा लोकतांत्रिक कर्मकांड संपन्न हुआ! अब यह अलग बात है कि लोकतंत्र में अब इंसाफ़ सड़क पर नहीं, ट्विटर थ्रेड में मिलता है।

इस पूरे मामले में पुलिस, नेता और प्रशासन एक शानदार भूमिका निभा रहे हैं। पुलिस का कहना है—”हम निष्पक्ष जांच करेंगे!” नेता का कहना है—”हम पत्रकारों के साथ हैं!” और पत्रकार सोच रहे हैं—”हम किसके साथ हैं?”

तो, भाइयों और बहनों, इस देश में अगर आप पत्रकार हैं, तो दो बातों का ध्यान रखें—

  1. सच्चाई की खोज में मत निकलिए, क्योंकि यहाँ झूठ का साम्राज्य है।
  2. अगर आपको फोन आए और कोई कहे, “बस एक औपचारिकता है, थाने आ जाइए”, तो तुरंत घर के बाहर ‘To Let’ का बोर्ड लगाकर शहर छोड़ दीजिए!

लेखक: अनुराग द्वारी, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

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