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नई दिल्ली।मानसून के मौसम में लगातार बारिश से बेल वाली सब्जियों के सड़ने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में कम जगह और सीमित बजट में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए मचान विधि कारगर तरीका है। इस विधि में लौकी, तोरई, करेला, खीरा और परवल जैसी बेल वाली सब्जियों को जमीन पर उगाने के बजाय लकड़ी या बांस के ढांचे के सहारे ऊपर चढ़ाया जाता है।

मचान विधि से बारिश का पानी सीधे फल और पत्तियों के संपर्क में नहीं आता। फल जमीन की गीली मिट्टी से दूर ऊंचे ढांचे पर लटकते हैं, जिससे सड़ने-गलने का खतरा समाप्त हो जाता है। इससे फसल की क्वालिटी बेहतर रहती है और बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। कम जमीन वाले किसान इस विधि से जमीन की सतह खाली रखकर नीचे धनिया, पालक जैसी पत्तेदार सब्जियां उगा सकते हैं और डबल कमाई कर सकते हैं।

इस विधि में पौधों को भरपूर धूप और हवा मिलती है, जिससे वेंटिलेशन अच्छा रहता है। फंगल इंफेक्शन और कीड़ों का हमला कम होता है, कीटनाशकों का इस्तेमाल घटता है और ऑर्गेनिक फसल मिलती है। मचान बनाने के लिए 6 से 8 फीट लंबे बांस के खंभे गाड़कर उन पर तार, सूतली या प्लास्टिक का जाल बांधा जाता है। बेलों को धीरे-धीरे जाल पर चढ़ाया जाता है।बारिश में मचान विधि से खेती सब्जियों को बर्बादी से बचाती है और प्रति एकड़ पैदावार बढ़ाती है।

क्या है मचान विधि?

मचान विधि में बेल वाली सब्जियों को जमीन पर फैलाने के बजाय बांस, लकड़ी या लोहे के खंभों की सहायता से बनाए गए ऊंचे ढांचे पर चढ़ाया जाता है। इन खंभों के ऊपर तार, मजबूत सूतली या प्लास्टिक की जाली बांधी जाती है, जिस पर बेलों को धीरे-धीरे बढ़ने दिया जाता है।

इस तकनीक के कारण पौधों की बेलें जमीन से ऊपर रहती हैं और फल खुले वातावरण में लटकते हैं। इससे फसल का विकास बेहतर होता है और बारिश के मौसम में होने वाले कई नुकसान से बचाव संभव हो जाता है।

बारिश में क्यों फायदेमंद है यह तकनीक?

मानसून के दौरान लगातार बारिश होने पर जमीन में अत्यधिक नमी बनी रहती है। यदि बेलें और फल सीधे मिट्टी के संपर्क में रहते हैं तो उनमें सड़न, फफूंद और बैक्टीरिया जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

मचान विधि अपनाने पर फल जमीन से ऊपर रहते हैं। इससे बारिश का पानी सीधे फलों पर लंबे समय तक नहीं ठहरता और गीली मिट्टी के संपर्क से होने वाली सड़न की संभावना काफी कम हो जाती है। फल साफ-सुथरे और आकर्षक बने रहते हैं, जिससे उनकी बाजार में मांग भी अधिक रहती है।

कुल मिलाकर, मानसून के मौसम में बेल वाली सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए मचान विधि एक प्रभावी कृषि तकनीक साबित हो सकती है। यदि किसान इसे वैज्ञानिक तरीके से अपनाएं और समय-समय पर पौधों की देखभाल करें, तो फसल की गुणवत्ता, उत्पादन और आय—तीनों में सकारात्मक सुधार संभव है। यह तकनीक आधुनिक, टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।


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