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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली। पारंपरिक फसलों जैसे धान और मक्का में लागत और मेहनत दोनों अधिक लगती है। इसलिए किसान अब ऐसी फसलों की तलाश कर रहे हैं जिनमें मेहनत कम लगे और कमाई अच्छी हो। आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण औषधीय पत्तियों की बाजार में कीमत ऊंची है। मानसून का मौसम इन पौधों को लगाने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इस समय हवा में नमी रहती है और पौधों को बढ़ने के लिए जरूरी पानी प्राकृतिक रूप से मिल जाता है।

एलोवेरा की खेती

एलोवेरा की मांग ब्यूटी प्रोडक्ट्स, दवाइयों और जूस बनाने वाली कंपनियों में सालभर बनी रहती है। इसकी खेती में बहुत ज्यादा पानी या उपजाऊ जमीन की जरूरत नहीं होती। इसे जलभराव वाली जमीन को छोड़कर किसी भी मिट्टी में उगाया जा सकता है। एक बार लगाने के बाद यह पौधा तीन से पांच साल तक फसल देता है। एक एकड़ में एलोवेरा लगाकर किसान सालाना डेढ़ से दो लाख रुपये तक कमा सकते हैं।

तुलसी की खेती

तुलसी का इस्तेमाल सर्दी-खांसी की दवाइयों, हर्बल टी और इम्यूनिटी बूस्टर सिरप में होता है। मानसून की शुरुआत में इसकी नर्सरी तैयार करके पौधों को खेतों में लगाया जाता है। इसे बढ़ने में केवल तीन से चार महीने लगते हैं और इसमें कीड़े लगने का खतरा भी कम होता है। डाबर और पतंजलि जैसी कंपनियां सीधे किसानों से तुलसी के पत्ते और बीज खरीद लेती हैं। इससे किसानों को प्रति एकड़ 50 हजार से 80 हजार रुपये तक का मुनाफा हो सकता है।

लेमनग्रास की खेती

लेमनग्रास के पत्तों से निकलने वाले तेल की मांग कॉस्मेटिक्स, साबुन और हर्बल चाय में अधिक है। इसकी खासियत यह है कि जंगली जानवर और गाय-भैंस इसे नहीं खाते, इसलिए फसल बर्बाद होने का डर नहीं रहता। इसके तेल को बाजार में बेचकर किसान सालाना प्रति एकड़ एक से डेढ़ लाख रुपये का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं।

स्टीविया या मीठी तुलसी की खेती

स्टीविया की पत्तियां चीनी से 200 गुना ज्यादा मीठी होती हैं लेकिन इनमें कैलोरी नहीं होती। पत्तियों को सुखाकर पाउडर बनाया जाता है जिसे कंपनियां नेचुरल स्वीटनर के रूप में खरीदती हैं। एक एकड़ में स्टीविया की खेती से साल में दो से तीन बार पत्तियां तोड़कर किसान दो से तीन लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं।

क्यों बढ़ रही है औषधीय पौधों की मांग?

पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेदिक दवाइयों, हर्बल कॉस्मेटिक्स, स्वास्थ्यवर्धक पेय पदार्थों और प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। एलोवेरा, तुलसी, अश्वगंधा, गिलोय, सर्पगंधा और ब्राह्मी जैसे औषधीय पौधों का उपयोग विभिन्न उद्योगों में किया जाता है। यही कारण है कि इनकी बाजार में मांग पूरे वर्ष बनी रहती है।

अगर किसान पहले से ही खेती कर रहे हैं, तो वे अपनी पारंपरिक फसलों के साथ कुछ हिस्से में औषधीय पौधों की खेती करके आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सकते हैं।

चलते चलते बता दें कि, पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक बेहतर विकल्प बन सकती है। मानसून का मौसम एलोवेरा, तुलसी और अन्य औषधीय पौधों की रोपाई के लिए अनुकूल माना जाता है, जिससे शुरुआती लागत कम रखने और पौधों की अच्छी वृद्धि में मदद मिलती है।

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