धान भारत की मुख्य फसलों में से एक है, लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी खेती पर बोनापन बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिक भाषा में इसे साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस कहते हैं। इस वायरस के असर से धान के पौधे सही लंबाई तक नहीं बढ़ पाते और छोटे रह जाते हैं। पौधों में बालियां नहीं बनतीं या बहुत कमजोर निकलती हैं, जिससे पैदावार में 80 से 100 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। शुरुआत में किसान इसे खाद या पोषण की कमी समझकर गलत दवाइयों या खादों का छिड़काव कर देते हैं।
लक्षण और पहचान
इस बीमारी के लक्षण रोपाई के 15 से 30 दिनों के अंदर दिखने लगते हैं। बीमार पौधा आम पौधों से काफी छोटा, झाड़ी जैसा और गहरे हरे रंग का नजर आता है। पत्तियां कड़क, मुड़ी हुई और हल्की पीली पड़ जाती हैं। बीमारी बढ़ने पर तने और पत्तियों की नसों पर काले या भूरे रंग की धारियां बनने लगती हैं। इन पौधों की जड़ें पूरी तरह नहीं बढ़ पातीं, जिससे पौधा मिट्टी से जरूरी खुराक और पानी नहीं खींच पाता। फसल तैयार होने पर बालियां नहीं निकलतीं या बहुत छोटी और खाली रह जाती हैं। अगर खेत में अचानक जगह-जगह पौधे छोटे दिखें और उखाड़ने पर जड़ें सड़ी या गुच्छेदार लगें तो समझें कि बोनापन वायरस आ चुका है।
फैलने का कारण
यह वायरस मिट्टी या बीज से नहीं फैलता। इसे फैलाने वाला मुख्य कीड़ा सफेद पीठ वाला फुदका यानी व्हाइट बैक्ड प्लांटहॉपर है। यह कीड़ा बीमार पौधे का रस चूसने पर वायरस अपने अंदर ले लेता है और फिर स्वस्थ पौधों पर रस चूसकर बीमारी फैला देता है। तेज हवा के साथ यह फुदका एक खेत से दूसरे खेत में पहुंच जाता है। खेत में ज्यादा पानी भरा रहना, लगातार नमी और जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना कीड़ों की संख्या बढ़ा देता है। खेत के आसपास घास और खरपतवार भी इनकी बढ़ोतरी में मदद करते हैं।
बचाव के उपाय
फसल बचाने के लिए खेत में सफेद पीठ वाले फुदके पर नजर रखें। अगर एक पौधे पर दो से तीन फुदके दिखें तो तुरंत ट्रिफ्लूमेजोपिरिम 10 प्रतिशत एससी या डिनोटेफ्यूरॉन 20 प्रतिशत एसजी जैसी कीटनाशक दवाओं का सही मात्रा में छिड़काव करें। यूरिया का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से ही करें और नीम कोटेड यूरिया का प्रयोग करें। खेत में लगातार पानी न भरें, बीच-बीच में पानी निकालकर सूखने दें। छोटे और बीमार पौधों को तुरंत उखाड़कर मिट्टी में दबा दें या जला दें। मेड़ों की सफाई रखें और अच्छी किस्म के बीजों का चुनाव करें।
क्या है साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस?
यह एक विषाणुजनित (वायरल) रोग है, जो सीधे मिट्टी या बीज के माध्यम से नहीं फैलता। यह बीमारी मुख्य रूप से सफेद पीठ वाले फुदके (White Backed Planthopper – WBPH) नामक कीट के जरिए एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचती है।
जब यह कीट संक्रमित पौधे का रस चूसता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद यही कीट स्वस्थ पौधों पर बैठकर रस चूसता है और वायरस को नई फसल में फैला देता है। तेज हवाओं के साथ यह कीट एक खेत से दूसरे खेत तक आसानी से पहुंच सकता है, जिससे रोग का प्रसार तेजी से होता है।
बीमारी फैलने के प्रमुख कारण
साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस का प्रसार कई परिस्थितियों में तेजी से हो सकता है। इनमें प्रमुख कारण हैं—
- सफेद पीठ वाले फुदके की अधिक संख्या।
- खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहना।
- अत्यधिक नमी वाला वातावरण।
- जरूरत से अधिक यूरिया का उपयोग।
- खेतों के आसपास खरपतवार और जंगली घास की अधिकता।
- संक्रमित पौधों को समय पर न हटाना।
इन परिस्थितियों में कीटों की संख्या तेजी से बढ़ती है और वायरस के फैलने की संभावना भी अधिक हो जाती है।
आखिर में बताते चले कि, साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस धान की फसल के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। यह रोग सीधे बीज या मिट्टी से नहीं, बल्कि सफेद पीठ वाले फुदके के माध्यम से फैलता है और समय पर नियंत्रण न होने पर उत्पादन में भारी गिरावट ला सकता है। इसलिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे फसल की नियमित निगरानी करें, शुरुआती लक्षणों की सही पहचान करें, खेत का संतुलित प्रबंधन अपनाएं और आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उचित कीट नियंत्रण उपाय अपनाएं। वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और समय पर सावधानी बरतकर इस रोग से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
