नई दिल्ली।2 अप्रैल 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 1.8 प्रतिशत तक मजबूत हुआ और 93.17 के स्तर पर पहुंच गया। यह सितंबर 2013 के बाद 12 साल से अधिक समय में रुपये की सबसे बड़ी एक दिन की तेजी बताई गई है। 30 मार्च को रुपया 95 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया था।
आरबीआई ने फॉरेक्स मार्केट को कड़ा करने का फैसला लिया है। इसके तहत बैंकों को रेजिडेंट और नॉन-रेजिडेंट कस्टमर्स को रुपये में नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट जारी करने से रोक दिया गया है। कंपनियां रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक नहीं कर सकेंगी। आरबीआई ने करेंसी में अस्थिरता कम करने के लिए अतिरिक्त उपाय भी पेश किए हैं और बैंकों के ऑफशोर लॉन्ग डॉलर पोजीशन को कम करने की प्रक्रिया जारी रखी है।
आरबीआई के इन कड़े कदमों के बाद मुद्रा बाजार में कारोबार शुरू होते ही रुपये में तेजी दर्ज की गई। मार्च में विदेशी संस्थागत निवेशकों की 1.11 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली के बावजूद रुपये में गिरावट थम गई और उछाल आया।आरबीआई के फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट नियमों में बदलाव के बाद यह तेजी देखी गई। इससे मुद्रा बाजार में स्थिरता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का उपयोग अक्सर विदेशी निवेशक और कंपनियां मुद्रा के उतार-चढ़ाव से बचने या सट्टेबाजी के लिए करते हैं। आरबीआई द्वारा इस पर रोक लगाने से विदेशी बाजारों में रुपये पर दबाव कम होगा और इसकी वास्तविक कीमत को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आरबीआई अपने इन कदमों को किस तरह आगे बढ़ाता है और बाजार इन पर कैसी प्रतिक्रिया देता है। फिलहाल, रुपये की इस मजबूती ने बाजार में नई ऊर्जा और भरोसा पैदा किया है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है।
