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कोलकाता।पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की समय-सीमा बढ़ाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई फिलहाल निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच सकी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि इस तरह बार-बार समय-सीमा बढ़ाने की अनुमति दी गई, तो “सिस्टम का मज़ाक बन जाएगा।” इसके साथ ही अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख मंगलवार, 3 फरवरी तय कर दी है।

लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की कसौटी

SIR को लेकर उठे इस विवाद ने एक बार फिर लोकतंत्र में मतदाता अधिकार बनाम प्रशासनिक सख़्ती की बहस को सामने ला दिया है। जहां चुनाव आयोग मतदाता सूची की शुद्धता को प्राथमिकता दे रहा है, वहीं राज्य सरकारें और कुछ राजनीतिक दल नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा पर ज़ोर दे रहे हैं।

यहां हम आपको यह बता दें कि, SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची का वह विशेष पुनरीक्षण है, जिसमें मतदाताओं के नाम, पते, पहचान और पात्रता की गहन जांच की जाती है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची से फर्जी, मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना और पात्र नागरिकों को शामिल करना होता है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद ज़रूरी है।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने राज्य की चिंताओं को रखा। उन्होंने कहा कि SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं, जबकि उनमें से कई पूरी तरह वैध और पात्र मतदाता हैं। सिब्बल ने दलील दी कि इतनी कम समय-सीमा में आपत्तियों और दावों की प्रक्रिया पूरी करना व्यावहारिक नहीं है।

जानकारी दे दें कि, अब सभी की निगाहें 3 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह तय होगा कि SIR की मौजूदा समय-सीमा बरकरार रहेगी या मतदाताओं को कोई राहत मिलेगी। यह फैसला न सिर्फ़ संबंधित राज्यों, बल्कि देश की चुनावी व्यवस्था के भविष्य के लिए भी अहम माना जा रहा है।

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