कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम समुदाय की गोलबंदी (consolidation) लंबे समय से एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल मुद्दा रहा है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 27 प्रतिशत है, जो कई जिलों जैसे मुर्शिदाबाद (66 प्रतिशत से अधिक), मालदा (51 प्रतिशत) और उत्तर 24 परगना के कुछ हिस्सों में बहुमत या निर्णायक स्थिति में है। इन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2026 विधानसभा चुनाव से पहले, टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर के प्रयासों से मुस्लिम समुदाय की सामाजिक-राजनीतिक एकजुटता की चर्चा फिर तेज हो गई है। कोलकाता
राजनीतिक विश्लेषक मोईदुल इस्लाम के अनुसार, धार्मिक नेता भावनाओं को भड़का सकते हैं और बड़ी भीड़ जुटा सकते हैं, लेकिन वे वोटों को सीटों में बदलने में सक्षम नहीं होते। मतदाताओं का मुख्य सवाल सरल होता है: “कौन जीत सकता है? कौन भाजपा को रोक सकता है?” बंगाल की राजनीति में भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से (tactically) वोट देते हैं। वे जानते हैं कि वोट का बंटवारा भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है,
बता दें कि, हुमायूं कबीर की मौजूदा कोशिश भी इसी पैटर्न का हिस्सा लगती है। उन्होंने टीएमसी से निलंबन के बाद JUP बनाई और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में सक्रियता बढ़ाई। वे AIMIM, आईएसएफ के साथ गठबंधन की बात कर रहे हैं और 135-180 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का दावा कर रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि संगठन की कमी, विश्वसनीय गठबंधन की अनुपस्थिति और भाजपा के डर से मुस्लिम मतदाता फिर टीएमसी के साथ रहेंगे।
जानकारी दे दें कि, बंगाल में चुनावी गणित भावनाओं से ज्यादा संगठन, गठबंधन और रणनीतिक वोटिंग पर आधारित है। जब तक कोई मुस्लिम-नेतृत्व वाली पार्टी मजबूत राज्यव्यापी संगठन, क्रॉस-कम्युनिटी अपील और जीतने की क्षमता नहीं दिखाती, तब तक ऐसी गोलबंदियां सिर्फ चर्चा और मीडिया हाइलाइट्स तक सीमित रहेंगी। मुस्लिम मतदाता अपनी सुरक्षा और विकास को प्राथमिकता देते हैं, और फिलहाल टीएमसी ही उन्हें सबसे मजबूत विकल्प लगती है।
