नई दिल्ली। आजादी के समय भारत के सामने बड़ी आबादी का पेट भरने की चुनौती थी। खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर थी, पैदावार कम थी और देश को खाने के लिए दूसरे देशों से मदद लेनी पड़ती थी। 1947 में करीब 72 प्रतिशत कामगार खेती से जुड़े थे और देश की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग आधा था। तब भारत में करीब पांच करोड़ टन खाद्यान्न पैदा होता था। ज्यादातर किसान बारिश के भरोसे खेती करते थे और हल-बैल जैसे पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल करते थे। अच्छे बीज, खाद और आधुनिक तकनीक की सुविधा बहुत कम थी। खेती की जमीन का बंटवारा भी बराबर नहीं था। जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी जैसी पुरानी व्यवस्थाओं के कारण बड़ी मात्रा में जमीन जमींदारों और बिचौलियों के पास थी।
आजादी के बाद सरकार ने भूमि सुधारों पर जोर दिया। जे.सी. कुमारप्पा की अध्यक्षता वाली कृषि सुधार समिति ने राज्य और किसान के बीच बिचौलियों को हटाने की सिफारिश की। 1951 से जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे करीब दो करोड़ किसानों का राज्य के साथ सीधा संबंध बना। किरायेदारी सुधार, भूमि सीमा कानून और बिखरी हुई जोतों के समेकन जैसे कदम भी उठाए गए। हालांकि इन सुधारों को सभी राज्यों में एक जैसी सफलता नहीं मिली।
हरित क्रांति और उत्पादन में वृद्धि
1960 के दशक में लगातार खाद्य संकट और सूखे के बीच हरित क्रांति की शुरुआत हुई। इसमें अधिक पैदावार देने वाले बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक, सिंचाई और कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा दिया गया। एम.एस. स्वामीनाथन ने भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल गेहूं की नई किस्मों को बढ़ावा देने में जरूरी भूमिका निभाई। गेहूं का उत्पादन 1965 में करीब 1.2 करोड़ टन से बढ़कर 1970 तक दो करोड़ टन हो गया। 1950-51 में करीब पांच करोड़ टन का खाद्यान्न उत्पादन आज 31.4 करोड़ टन से ज्यादा पहुंच चुका है। हरित क्रांति के साथ सिंचाई का विस्तार हुआ। नहरों और ट्यूबवेल के बढ़ते नेटवर्क ने किसानों की मानसून पर निर्भरता कम की। भाखड़ा-नांगल और दामोदर घाटी जैसी परियोजनाओं ने भी सिंचाई व्यवस्था को मजबूत किया। किसानों को बाजार में सुरक्षा देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद व्यवस्था को भी बढ़ावा मिला।
ड्रोन, एआई और डिजिटल खेती
अब कृषि ड्रोन कम समय में बड़े खेतों में समान रूप से छिड़काव करने में मदद कर रहे हैं। एक कृषि ड्रोन करीब एक घंटे में 10-15 एकड़ तक क्षेत्र कवर कर सकता है, जबकि मैनुअल छिड़काव में एक कर्मचारी दिनभर में लगभग एक से दो एकड़ ही कर पाता है। ड्रोन की मदद से फसलों में कीट और बीमारियों की जल्दी पहचान भी हो सकती है। डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत अब तक 7.63 करोड़ किसानों की डिजिटल आईडी बन चुकी है, जिनमें 1.93 करोड़ महिला किसान भी शामिल हैं। किसान ई-मित्र चैटबॉट रोजाना आठ हजार से ज्यादा सवालों के जवाब दे रहा है और 11 क्षेत्रीय भाषाओं में काम करता है। एआई का इस्तेमाल फसल निगरानी में भी हो रहा है। भारत-विस्तार जैसे एआई टूल के जरिए किसानों को उनकी अपनी भाषा में मौसम, मिट्टी, फसल और सरकारी योजनाओं से जुड़ी सलाह देने की तैयारी है।
भूमि सुधारों से शुरू हुआ बदलाव
आजादी के बाद सरकार ने कृषि व्यवस्था में सुधार के लिए भूमि सुधारों को महत्वपूर्ण प्राथमिकता दी। जे.सी. कुमारप्पा की अध्यक्षता वाली कृषि सुधार समिति ने राज्य और किसान के बीच बिचौलियों को हटाने की दिशा में महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं।
1950 के दशक में विभिन्न राज्यों ने जमींदारी उन्मूलन के लिए कानून बनाए। इसका उद्देश्य किसानों और राज्य के बीच सीधे संबंध को मजबूत करना था। इसके साथ किरायेदारी सुधार, भूमि की अधिकतम सीमा तय करने वाले कानून और बिखरी हुई कृषि जोतों के समेकन जैसे उपाय भी अपनाए गए।
आखिर में बता दें कि, आजादी के समय जिस भारतीय कृषि व्यवस्था की पहचान मानसून पर निर्भरता, पारंपरिक औजारों और कम उत्पादकता से थी, वह अब वैज्ञानिक और डिजिटल तकनीकों की ओर बढ़ रही है। हालांकि छोटे और सीमांत किसानों तक आधुनिक तकनीक, सिंचाई, बाजार और वित्तीय सुविधाओं की समान पहुंच सुनिश्चित करना अभी भी बड़ी चुनौती है। आने वाले वर्षों में भारतीय खेती की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तकनीकी प्रगति के साथ किसानों की आय, प्राकृतिक संसाधनों और खेती की स्थिरता को कितना संतुलित किया जाता है।
