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नई दिल्ली। देशभर में इस गर्मी के मौसम में जामुन की भरपूर फसल देखने को मिल रही है। बाजारों में किलो के हिसाब से बिक रहा गहरे बैंगनी रंग का यह फल सड़कों पर आम हो गया है। पिछले साल जहां जामुन के पेड़ों पर फल कम थे, इस बार पेड़ लदे हुए हैं। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स में एक पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए दावा किया जा रहा है कि गर्मियों में जामुन के पेड़ पर ज्यादा फल आने से सूखे की संभावना बढ़ जाती है।

मार्च-अप्रैल में जामुन के पेड़ों पर बौर आता है, जिसमें सफेद सुगंधित फूलों के गुच्छे बनते हैं। यदि इस दौरान बारिश होती है तो फूल झड़ जाते हैं और फसल को नुकसान होता है। इस साल 2026 में पूरे भारत में प्री-मॉनसून यानी वसंत ऋतु असामान्य रूप से सूखी रही। अरब सागर में मॉनसून रुका हुआ था और महाराष्ट्र व कर्नाटक में जून में 40 से 54 प्रतिशत तक बारिश की कमी दर्ज की गई। इसी सूखी स्थिति ने जामुन के पेड़ों के लिए बौर टिकने में मदद की और भरपूर उपज हुई।वनस्पति वैज्ञानिकों के अनुसार, जामुन की यह भरपूर फसल ‘स्ट्रेस फ्रूटिंग’ पर आधारित है। पानी की कमी का सामना कर रहे पेड़ विकास से हटकर बीज उत्पादन पर फोकस कर देते हैं। यह पिछले सूखे (सूखी वसंत) का नतीजा है, न कि आने वाले सूखे की भविष्यवाणी।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अल नीनो की घोषणा की है, जिससे इस साल मॉनसून की बारिश लंबी अवधि के औसत का 90-92 प्रतिशत रहने की संभावना है। जामुन के पेड़ों के लिए यह सूखी परिस्थितियां फायदेमंद साबित हुई हैं, लेकिन बारिश पर निर्भर किसानों के लिए चिंताजनक हैं। जामुन में एंटीऑक्सीडेंट गुण भरपूर होते हैं और आयुर्वेद में इसे डायबिटीज कंट्रोल के लिए उपयोगी माना जाता है।

कैसे बनती है जामुन की अच्छी फसल?

जामुन के पेड़ों में सामान्यतः मार्च और अप्रैल के दौरान बौर आता है। इस समय पेड़ों पर छोटे-छोटे सफेद और सुगंधित फूलों के गुच्छे विकसित होते हैं, जो आगे चलकर फलों में बदलते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया मौसम पर काफी हद तक निर्भर करती है।

यदि बौर आने के समय लगातार बारिश या तेज हवाएं चलें तो बड़ी संख्या में फूल झड़ सकते हैं। इससे फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और कुल उत्पादन घट जाता है। दूसरी ओर यदि इस अवधि में मौसम अपेक्षाकृत शुष्क रहे और अत्यधिक वर्षा न हो तो फूल सुरक्षित रहते हैं तथा अधिक संख्या में फल विकसित हो पाते हैं।

विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि इस वर्ष जामुन की भरपूर फसल को भविष्य के सूखे का संकेत मानना सही नहीं होगा। यह मुख्य रूप से सूखी प्री-मानसून परिस्थितियों, बौर के सुरक्षित रहने और पौधों की प्राकृतिक ‘स्ट्रेस फ्रूटिंग’ प्रक्रिया का परिणाम है।

इसलिए सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ऐसे दावों को बिना वैज्ञानिक प्रमाण के सही मानने के बजाय विश्वसनीय मौसम संबंधी आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय पर भरोसा करना अधिक उचित है। जामुन की अच्छी फसल निश्चित रूप से इस मौसम की एक सकारात्मक प्राकृतिक घटना है, लेकिन इसे आने वाले मानसून या संभावित सूखे की भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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