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समाचार मिर्ची

लखनऊ। लखनऊ के गोमती नगर स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (जेपीएनआईसी) को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार की कैबिनेट ने जेपीएनआईसी परिसर को 30 साल की लीज पर ‘जैसे है जहां है’ की शर्त पर दो निजी कंपनियों—वृंदावन बॉटलर्स और रॉकवुड होटल्स—को सौंपने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। निजी कंपनियां लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को शुरुआती सालाना लीज रेंट 6 करोड़ रुपये देंगी, जिसमें हर वर्ष 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी। 30 साल की लीज अवधि में कंपनियां सरकार को कुल 800 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देंगी और साथ ही करीब 200-250 करोड़ रुपये के बचे हुए कार्यों को पूरा करेंगी।

जानकारी दे दें कि, यह 18 मंजिला इमारत समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल का ड्रीम प्रोजेक्ट थी। 2013 में दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर की तर्ज पर शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का शुरुआती बजट करीब 265 करोड़ रुपये था, जो बाद में बढ़कर लगभग 864 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सपा सरकार के कार्यकाल के अंत तक इमारत लगभग तैयार थी और 2017 में अखिलेश यादव ने इसका उद्घाटन कर दिया था, हालांकि निर्माण कार्य पूरी तरह संपन्न नहीं हुआ था। भाजपा सरकार आने के बाद वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों पर जांच शुरू की गई और इमारत पिछले नौ सालों से बंद पड़ी रही।

अखिलेश यादव ने इस फैसले पर सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा सरकार है या दुकानदार। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी संपत्तियों का निजीकरण कर नाकामियों को छुपाया जा रहा है। सपा का कहना है कि 2017 के बाद योगी सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना से इस प्रोजेक्ट को रोक दिया। अखिलेश यादव ने पहले भी सरकार से अपील की थी कि नाम बदल ले, लेकिन इमारत को जर्जर न होने दे और यदि सपा को सौंपा जाए तो वे चंदा जुटाकर इसे चला सकते हैं। दूसरी ओर, भाजपा का आरोप रहा है कि सपा सरकार ने बजट को बिना वजह बढ़ाया और आधी-अधूरी इमारत का उद्घाटन कर वाहवाही लूटने की कोशिश की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सपा पर इस इमारत के निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।

आखिर मे बता दें कि, जेपीएनआईसी में जयप्रकाश नारायण की भव्य मूर्ति भी लगी है और हर साल उनकी जयंती पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा माल्यार्पण के प्रयासों को लेकर प्रशासनिक बाधाएं और राजनीतिक घमासान देखने को मिलता रहा है। अब निजी कंपनियों को लीज पर दिए जाने के फैसले से दोनों दलों के बीच विरासत और प्रबंधन को लेकर सियासी तनातनी और बढ़ गई है।

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