समाचार मिर्ची

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर इतिहास रच दिया। 4 फरवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने ममता बनर्जी ने खुद अपनी दलीलें रखीं और कहा कि यह प्रक्रिया वोटरों को हटाने (deletion) पर केंद्रित है, न कि शामिल करने (inclusion) पर। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और लाखों वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं।

गौरतलब हैं कि, ममता बनर्जी, जो मूल रूप से एक वकील (एडवोकेट) रही हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर कहा, “सर, मुझे बोलने दीजिए… SIR केवल डिलीशन के लिए है, इनक्लूजन के लिए नहीं।” उन्होंने बताया कि नामों की वर्तनी में मामूली अंतर (name mismatch), शादी के बाद महिलाओं के टाइटल बदलने या पति के सरनेम अपनाने जैसी सामान्य बातों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ बताकर नाम हटाए जा रहे हैं। ममता ने कहा कि बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं, पता बदल जाता है, लेकिन इसे मिसमैच मानकर उनका वोटर अधिकार छीना जा रहा है। इसी तरह प्रवासी मजदूरों और अन्य लोगों के नाम भी प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पहले चरण में लगभग 58 लाख नाम हटाए गए और दूसरे चरण में करीब 1.3 करोड़ नाम जांच के दायरे में हैं।

हम आपको बता दें कि, मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR प्रक्रिया 24 साल बाद हो रही है और इसे केवल तीन महीने में पूरा करने की क्या जल्दबाजी है? उन्होंने कहा कि त्योहारों और फसल कटाई के मौसम में नोटिस जारी किए जा रहे हैं, जब लोग घरों से दूर होते हैं। ममता ने आरोप लगाया कि बीजेपी शासित राज्यों से आए माइक्रो ऑब्जर्वर स्थानीय बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO) को ओवरराइड कर रहे हैं और स्थानीय चुनावी कर्मचारियों को साइडलाइन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वैध दस्तावेज जैसे आधार कार्ड को भी अस्वीकार किया जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन नहीं हो रहा। ममता ने ECI को “WhatsApp Commission” कहकर कटाक्ष किया और लोकतंत्र बचाने की अपील की।

इस कड़ी में चुनाव आयोग की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि बंगाल में SIR प्रक्रिया हिंसा, धमकियों और राजनीतिक दबाव से प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही, लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनावी अधिकारी अपनी ड्यूटी नहीं निभा पा रहे। ECI ने दावा किया कि 2025 की वोटर लिस्ट में सवाल हैं और SIR जरूरी है ताकि मृतकों, अयोग्य लोगों और फर्जी नामों को हटाया जा सके। आयोग ने कहा कि सभी नोटिस में कारण बताए जाते हैं और जिनके नाम हटे हैं, उन्हें अधिकृत एजेंटों के साथ अपील करने की अनुमति है।

वही, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR विवाद बंगाल की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है। टीएमसी इसे बीजेपी और ECI द्वारा बंगाल को टारगेट करने का आरोप बता रही है, जबकि बीजेपी का कहना है कि यह वोटर लिस्ट साफ करने की सामान्य प्रक्रिया है और टीएमसी अवैध घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रही है। अदालत ने ECI को 10 फरवरी तक जवाब दाखिल करने को कहा है और मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी। इस बीच, लाखों मतदाताओं का भविष्य दांव पर लगा है और लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। ममता बनर्जी की यह कोशिश न केवल उनके राज्य के वोटरों के अधिकारों की रक्षा के लिए है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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