नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को खुद अदालत में उपस्थित होकर अपनी याचिका पर दलीलें पेश कीं, जो एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है। यह पहला मौका है जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका पर बहस कर रही हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और हर असली नागरिक को मतदाता सूची में बनाए रखने का स्पष्ट आश्वासन दिया। अगली सुनवाई 9 फरवरी को निर्धारित की गई है।
यह विवाद पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे चुनाव आयोग ने जून 2025 और अक्टूबर 2025 के आदेशों के तहत शुरू किया था। SIR के तहत राज्य में मतदाता सूची की गहन जांच की जा रही है, जिसमें लाखों नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (तार्किक असंगतियां) चिह्नित की गई हैं। ममता बनर्जी की याचिका में आरोप है कि यह प्रक्रिया बंगाल को विशेष रूप से निशाना बना रही है और लाखों वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पहले चरण में 58 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए, जबकि दूसरे चरण में 1.3 करोड़ से ज्यादा नाम जांच के दायरे में हैं।
इन सब के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद अदालत में बोलते हुए भावुक अपील की। उन्होंने कहा, “मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं। मैं एक बंधुआ मजदूर जैसी हूं। मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं, मैं एक साधारण नागरिक हूं।” उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में मामूली स्पेलिंग या उच्चारण की गलतियों पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। ममता ने कहा, “बंगाल को टारगेट किया जा रहा है। लोग बुलडोजर की तरह कुचले जा रहे हैं।” उन्होंने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सएप कमीशन’ कहकर आलोचना की और दावा किया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर भाजपा शासित राज्यों से नियुक्त किए गए हैं, जबकि स्थानीय कर्मचारियों को दरकिनार किया जा रहा है।
इस संबंध में बता दें कि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ममता बनर्जी को आश्वस्त किया। उन्होंने कहा, “हर एक असली व्यक्ति मतदाता सूची में बना रहना चाहिए। चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।” CJI ने स्पष्ट किया कि मामूली स्पेलिंग गलतियों पर नोटिस जारी नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि प्रक्रिया में संवेदनशीलता बरती जाए। पीठ ने माइक्रो-ऑब्जर्वर की नियुक्ति पर भी नोटिस जारी किया और पश्चिम बंगाल सरकार से क्लास-II अधिकारियों की सूची मांगी। CJI ने कहा कि बंगाल में भाषाई और ट्रांसलिटरेशन की समस्याएं आम हैं, लेकिन इससे प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने हर वैध मतदाता के अधिकार की रक्षा पर जोर दिया।
चलते चलते बता दें कि, विपक्षी नेता जैसे अखिलेश यादव ने ममता का समर्थन किया है, जबकि कुछ विश्लेषक इसे राजनीतिक रणनीति मान रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वैध मतदाता वंचित नहीं होना चाहिए। अब सभी की निगाहें 9 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां चुनाव आयोग का जवाब और अदालत के निर्देश निर्णायक साबित हो सकते हैं।
