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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली । धान की रोपाई के बाद जब पौधे हरे-भरे होकर बढ़ रहे होते हैं, तब कई बार खेतों में पौधों का रंग तेजी से बदलने लगता है। अगर धान की फसल की पत्तियों पर हल्के पीले या कत्थई रंग के धब्बे दिखाई दें तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह खैरा रोग की दस्तक हो सकती है। समय रहते पहचान और इलाज न होने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है, तने कमजोर पड़ जाते हैं और कल्ले नहीं फूटते, जिससे कुल पैदावार में 25 से 30 फीसदी तक गिरावट आ सकती है।

इस कड़ी में हम आपको बता दें कि, खैरा रोग का मुख्य कारण मिट्टी में जिंक की भारी कमी है। रोपाई के 15 से 20 दिन बाद निचली पत्तियों पर हल्के पीले धब्बे उभरते हैं, जो बाद में गहरे कत्थई या लाल-भूरे रंग में बदल जाते हैं। पत्तियां सिरों से सूखकर सिकुड़ने लगती हैं और पूरा पौधा बेजान दिखने लगता है। प्रभावित पौधों की जड़ें सामान्य सफेद के बजाय भूरी नजर आती हैं। खेत में जगह-जगह गोल दायरे में पौधों का सूखना भी जिंक की कमी का संकेत है।

जानकारी देते चले कि, लक्षण नजर आने पर तुरंत जिंक का छिड़काव करना चाहिए। प्रति एकड़ एक किलोग्राम जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत और 500 ग्राम बुझा हुआ चूना 100 से 150 लीटर साफ पानी में घोलकर सुबह या शाम के ठंडे मौसम में छिड़काव करें। बुझा चूना उपलब्ध न हो तो एक से दो किलोग्राम यूरिया मिलाकर घोल बनाया जा सकता है। रोग ज्यादा फैला हो तो 10 से 12 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें। इससे पौधे रिकवर होकर हरे-भरे हो जाते हैं।

आखिर में बताते चले कि, दोबारा रोग न लगे, इसके लिए अगली रोपाई से पहले खेत की आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ 10 से 12 किलोग्राम जिंक सल्फेट मिट्टी में मिला दें। लगातार धान-गेहूं की जगह फसल चक्र अपनाएं और दलहनी फसलें उगाएं। सड़ी गोबर की खाद, कंपोस्ट और ढैंचा जैसी हरी खाद का इस्तेमाल करें तथा समय-समय पर मिट्टी की जांच करवाएं।

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