समाचार मिर्ची

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वृंदावन के प्रसिद्ध रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, जिन्हें प्रेमानंद महाराज के नाम से जाना जाता है, अपनी सरलता, गहन भक्ति और जीवन-मृत्यु से जुड़े उपदेशों के लिए लाखों श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनका जन्म 30 मार्च 1969 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के निकट अखरी गांव में हुआ था। उनका मूल नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। बचपन से ही वे आध्यात्मिक खोज में लीन थे और मात्र 13 वर्ष की आयु में घर त्यागकर ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़े। वाराणसी में गंगा तट पर साधना करते हुए उन्होंने विभिन्न गुरुओं से मार्गदर्शन प्राप्त किया और अंततः वृंदावन पहुंचकर राधा वल्लभ संप्रदाय में दीक्षा ली।

महाराज जी ने स्पष्ट किया कि पछतावे से बचने का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है हर सांस में भगवान का नाम जपना। हर श्वास-प्रश्वास के साथ “प्रिय और प्रियतम” अर्थात राधा-कृष्ण या अपने आराध्य का नाम लेना चाहिए। ऐसा करने से जीवन भर अभ्यास बनता है और अंतिम समय में स्वाभाविक रूप से वही स्मरण होगा। उन्होंने कहा, “यदि हर सांस के साथ प्रिय और प्रियतम यानी भगवान का नाम लिया जाए और अंतिम समय में भी ईश्वर का स्मरण बना रहे, तो मृत्यु कोई दुखद घटना नहीं रहती। ऐसी मृत्यु एक महोत्सव के समान होती है।”

महाराज जी ने आगे बताया कि अंतिम क्षण में अचानक भगवान को याद करने की कोशिश लगभग असंभव है। जैसा जीवन बीता है, वैसा ही अंत होता है। यदि जीवन में नाम-जप का अभ्यास नहीं किया, तो अंतिम समय में मन सांसारिक मोहों में फंसा रहेगा—बैंक बैलेंस, पुत्र-पुत्री, संपत्ति या अन्य लगाव। ऐसे में पछतावा अवश्य आएगा। इसलिए वर्तमान क्षण को व्यर्थ न गंवाएं। बचपन से ही इसकी आदत डालें, या यदि उम्र हो गई हो तो अभी से संभल जाएं।

प्रेमानंद महाराज का यह उपदेश भजन मार्ग की मूल भावना पर आधारित है। वे निरंतर नाम-जप को जीवन का उद्देश्य बताते हैं। उनके अनुसार, नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। नाम जप से मन शुद्ध होता है, इंद्रियां वश में आती हैं और भय-चिंता दूर हो जाती है। मृत्यु के समय यदि नाम स्मरण हो, तो यमदूतों का भय नहीं रहता। भक्त के लिए मृत्यु ईश्वर के रूप में आती है और उसे परम आनंद की प्राप्ति होती है।

प्रेमानंद महाराज के ये उपदेश आज के व्यस्त जीवन में विशेष प्रासंगिक हैं। आजकल लोग सांसारिक सुखों में इतने व्यस्त हैं कि जीवन का उद्देश्य भूल जाते हैं। लेकिन महाराज जी की शिक्षाएं बताती हैं कि सच्ची सफलता पछतावे रहित मृत्यु में है, जो केवल भक्ति से संभव है। उनके भजन मार्ग चैनल पर लाखों लोग रोजाना सत्संग सुनते हैं और जीवन बदलते हैं।यदि आप भी पछतावे से मुक्त जीवन और मृत्यु चाहते हैं, तो आज से ही हर सांस में भगवान का नाम जपना शुरू करें। राधे राधे का जप करें, भजन गाएं और वर्तमान को भक्ति में लगाएं। प्रेमानंद महाराज का संदेश स्पष्ट है—नाम ही जीवन है, नाम ही मृत्यु को महोत्सव बना देता है।

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