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बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए ‘अति पिछड़ा न्याय संकल्प पत्र’ जारी किया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा किया गया यह ऐलान न केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामाजिक आधार को चुनौती देने वाला है, बल्कि महागठबंधन की अन्य पार्टियों – खासकर राजद और सपा – के लिए भी असहज स्थिति पैदा करने वाला है।

खास बात है कि इस 10 सूत्री अति पिछड़ा संकल्प बिहार चुनाव तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के नीतिगत दस्तावेजों का हिस्सा भी बनेगा। राहुल गांधी की यह पहल स्पष्ट रूप से बिहार और उत्तरप्रदेश समेत उन प्रदेशों में कांग्रेस का सामाजिक आधार बढ़ाने पर केंद्रित है जहां सामाजिक न्याय की राजनीति ने उससे हाशिए पर धकेल दिया।


सामाजिक न्याय के एजेंडे पर कांग्रेस की यह मुखरता खासतौर पर सपा और राजद की चिंता में इजाफा करने वाली हैं। लेकिन मुखर राष्ट्रवाद के साथ क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक हाशिए पर ले जाने की भाजपा की सियासत को देखते हुए कांग्रेस के साथ कदम ताल कर चलना फिलहाल इन दलों की जरूरत है।

राजद और सपा क्यों हो रही चिंतित?

राजद और सपा जैसे समाजवादी दल लंबे समय से सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रमुख वाहक माने जाते रहे हैं। लेकिन कांग्रेस जिस तरह जातीय जनगणना और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दों पर मुखर होकर आगे आ रही है, उसने इन दलों की पारंपरिक राजनीतिक जमीन को हिला दिया है।

जानकारी दें कि, साफ तौर पर यह कोशिश कांग्रेस के उस प्रयास का हिस्सा है, जिसके जरिए पार्टी मंडल राजनीति के बाद कमजोर हुए अपने सामाजिक आधार को दोबारा मजबूत करना चाहती है। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान लगातार सामाजिक न्याय और समानता को मुद्दा बनाकर इसकी नींव रखी थी।बता दें कि, अब पटना में मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में जारी यह संकल्प पत्र कांग्रेस के नई रणनीति का ठोस संकेत है।

बता दें कि, राहुल गांधी का यह कदम बिहार चुनाव को लेकर उनकी गंभीरता और कांग्रेस की नई रणनीति को स्पष्ट करता है। ‘अति पिछड़ा न्याय संकल्प पत्र’ ने न केवल नीतीश कुमार के वोट बैंक को चुनौती दी है, बल्कि राजद और सपा जैसी सहयोगी पार्टियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

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