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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली। टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह रहती है कि मेहनत से तैयार फसल किसी बीमारी की वजह से एक झटके में बर्बाद न हो जाए। लीफ कर्ल वायरस, डैम्पिंग ऑफ और जड़ में गांठ जैसी दिक्कतें अक्सर टमाटर की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित कर देती हैं। कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि अगर सही वक्त पर कुछ आसान उपाय अपना लिए जाएं तो फसल को इन बीमारियों से पूरी तरह बचाया जा सकता है।

लीफ कर्ल वायरस से बचाव के लिए संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से हटा देना चाहिए ताकि बीमारी बाकी पौधों तक न फैले। जैविक उपायों में यलो स्टिकी ट्रैप और नीम तेल का इस्तेमाल काफी असरदार माना जाता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि सिर्फ एक उपाय पर निर्भर रहने की बजाय एकीकृत प्रबंधन तकनीक अपनानी चाहिए।सूत्रकृमि की वजह से टमाटर की जड़ों में गांठें बन जाती हैं, जिससे पौधे पीले पड़ने लगते हैं और उनकी बढ़वार रुक जाती है। इससे बचाव के लिए मई और जून में खेत की गहरी जुताई करें और खेत को पारदर्शी पॉलीथिन से ढक दें ताकि धूप से मिट्टी में मौजूद सूत्रकृमि खत्म हो जाएं। रोग-प्रतिरोधी किस्में चुनना और खेत में सनई या गेंदे की फसल ट्रैप क्रॉप के तौर पर लगाना भी फायदेमंद रहता है।

जानकारी दे दें कि, डैम्पिंग ऑफ एक फंगल रोग है जो नर्सरी में छोटे पौधों को सड़ाकर बर्बाद कर देता है। इससे बचने के लिए खेत में पानी का ठहराव न होने दें और नर्सरी बेड को जमीन से करीब 15 सेंटीमीटर ऊंचा बनाएं ताकि पानी आसानी से निकल सके और फंगस पनपने का खतरा कम हो जाए। झुलसा रोग से फसल को बचाने के लिए हमेशा स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। संक्रमण दिखते ही खेत से संक्रमित पौधों को हटा देना चाहिए ताकि बीमारी पूरे खेत में न फैल पाए।हर साल एक ही खेत में लगातार टमाटर उगाने से बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए फसल चक्र अपनाना, टमाटर के बाद कोई और फसल लगाना, मिट्टी में बीमारी फैलाने वाले तत्वों को कम करने में मदद करता है। साथ ही खेत की नियमित सफाई और खरपतवार हटाते रहना भी फसल को सेहतमंद बनाए रखता है।

लीफ कर्ल वायरस से कैसे बचाएं टमाटर की फसल?

टमाटर में लीफ कर्ल वायरस एक महत्वपूर्ण समस्या है। संक्रमित पौधों में पत्तियां सिकुड़ने या मुड़ने लग सकती हैं और पौधे की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है। शुरुआती स्तर पर संक्रमण की पहचान होने पर किसान को संक्रमित पौधों को खेत से निकालकर अलग करना चाहिए।

संक्रमित पौधों को खेत में छोड़ने से रोग फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है। केवल रोगग्रस्त पौधों को हटाना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि वायरस फैलाने वाले कीटों की संख्या को नियंत्रित करना भी महत्वपूर्ण है।

सूत्रकृमि से जड़ों को बचाना जरूरी

टमाटर की खेती में जड़-गांठ सूत्रकृमि भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसके कारण पौधे की जड़ों पर गांठें बन सकती हैं। प्रभावित पौधों में पीलेपन के लक्षण दिखाई दे सकते हैं और उनकी बढ़वार कमजोर पड़ सकती है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में पौधे की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इस समस्या से बचाव के लिए मिट्टी का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। दी गई कृषि सलाह के अनुसार मई और जून में गहरी जुताई करने से मिट्टी में मौजूद कुछ हानिकारक जीवों के जीवन चक्र को प्रभावित करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा मिट्टी को पारदर्शी पॉलीथिन से ढककर सूर्य की गर्मी का उपयोग करने वाली सौर्यकरण तकनीक भी अपनाई जाती है।

आखिर मेंबताते चले कि, किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने का इंतजार करने के बजाय फसल की शुरुआत से निगरानी की जाए। नर्सरी से लेकर कटाई तक पौधों की नियमित जांच, मिट्टी और पानी का उचित प्रबंधन तथा रोग की शुरुआती पहचान नुकसान को सीमित करने में मदद कर सकती है।

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