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नई दिल्ली देश के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर संसद में एक बार फिर माहौल गरमा गया है। लोकसभा में सोमवार को इसके 150 वर्ष पूरे होने पर 10 घंटे लंबी विशेष बहस का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी बात रखी। यह बहस केवल एक गीत पर नहीं, बल्कि उस इतिहास, भावनाओं और राजनीतिक विरासत पर आधारित है जिसने आजादी के आंदोलन से लेकर आधुनिक राजनीति तक भारत की दिशा तय की है। आगामी दिन राज्यसभा में भी इसी मुद्दे पर चर्चा होगी, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हिस्सा लेंगे।

वही, दुर्भाग्य से, 1937 में ‘वंदे मातरम’ के महत्वपूर्ण छंदों… उसके एक हिस्से को अलग कर दिया गया। ‘वंदे मातरम’ के विभाजन ने विभाजन के बीज भी बोए। आज की पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के इस ‘महामंत्र’ के साथ यह अन्याय क्यों किया गया… यह विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए एक चुनौती है।

बहस क्यों शुरू हुई?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने इस चर्चा को हवा दी। उन्होंने 1937 में हुए एक फैसले का हवाला देते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। मोदी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा था। उनका आरोप था कि 1937 में कांग्रेस ने गीत के महत्वपूर्ण छंदों को अलग कर दिया और इससे विभाजनकारी सोच को जगह मिली।

गौरतलवब हैं कि, प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर कांग्रेस की उस भूमिका की ओर इशारा था जिसे वे आज गलत ठहराते हैं। उनका कहना था कि यह निर्णय उस समय भी विवादित था और आज भी यह देश की एकता के संदर्भ में समझने योग्य है। 937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि ‘वंदे मातरम्’ का केवल पहला छंद आधिकारिक रूप से स्वीकार किया जाएगा, क्योंकि अन्य छंद धार्मिक प्रतीकों पर आधारित माने गए और मुस्लिम समुदाय की आपत्तियाँ थीं।

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