समाचार मिर्ची

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ये खबर नौकरी पेशा वालों के लिए थोड़ी हैरान और चौंकाने वाली हो सकती है। क्योंकि गूगल जैसी कंपनी ने एक बार फिर अपने कर्मचारियों पर कैंची चलाई है। जी हां, गूगल, वो कंपनी जो सर्च इंजन से लेकर आपकी जिंदगी के हर कोने में दाखिल हो चुकी है, उसने अपनी क्लाउड इकाई में 100 से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये वो कर्मचारी हैं जो डिजाइन और यूजर अनुभव से जुड़े थे, जिनका काम था आपके और हमारे जैसे यूजर्स के व्यवहार को समझना, डाटा जुटाना, और गूगल के प्रोडक्ट्स को बेहतर बनाना। लेकिन अब, इनमें से कईयों की कुर्सियां खाली हैं। कुछ टीमों की ताकत आधी कर दी गई है।

सवाल ये है कि आखिर क्यों? और इसका मतलब क्या है?

गूगल का कहना है कि ये छंटनी लागत कम करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी AI, में निवेश बढ़ाने के लिए है। कंपनी ने प्रभावित कर्मचारियों को दिसंबर की शुरुआत तक दूसरी भूमिकाओं में जाने का मौका दिया है, लेकिन ये मौका कितना वास्तविक है, ये तो वही कर्मचारी बता सकते हैं जिनके सिर पर ये तलवार लटक रही है। ये खबर सिर्फ गूगल तक सीमित नहीं है। टेक की दुनिया में ये एक चलन बन चुका है। माइक्रोसॉफ्ट ने जुलाई में 9,000 नौकरियों पर कैंची चलाई थी। मेटा 2023 से कई बार छंटनी कर चुका है। और अब गूगल। ये कंपनियां एक-दूसरे से होड़ में हैं, लेकिन होड़ किस बात की? AI की। वो AI, जिसे ये कंपनियां भविष्य का तारणहार बता रही हैं।

सुंदर पिचई, गूगल के CEO, ने अपने कर्मचारियों को साफ-साफ कह दिया है—कंपनी को और तेज, और कुशल होना होगा। लेकिन कुशलता का ये रास्ता क्या उन लोगों की कीमत पर बन रहा है जिन्होंने गूगल को गूगल बनाया? यूजर अनुभव अनुसंधान और प्लेटफॉर्म सेवा जैसी टीमें, जो गूगल के प्रोडक्ट्स को हमारे लिए आसान और उपयोगी बनाती थीं, अब आधी रह गई हैं। इनके काम को अब शायद AI संभालेगा। लेकिन क्या AI उस संवेदनशीलता को समझ पाएगा, जो इंसानी दिमाग यूजर्स के डाटा और सर्वे से निकालता था?

ये खबर सिर्फ नौकरियों की नहीं है। ये उस दौड़ की कहानी है, जहां टेक दिग्गज एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए AI के रथ पर सवार हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा—सब AI इंफ्रास्ट्रक्चर में अरबों डॉलर डाल रहे हैं। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक स्याह हकीकत भी है। वो हकीकत है उन कर्मचारियों की, जिन्हें एक झटके में बता दिया जाता है कि उनकी सेवाओं की अब जरूरत नहीं। वो हकीकत है उस अनिश्चितता की, जो इन छंटनियों से पैदा होती है। तो सवाल ये है—क्या AI वाकई भविष्य है? या ये सिर्फ एक ऐसा बहाना है, जिसके पीछे कंपनियां अपनी लागत कम कर रही हैं और मुनाफे की होड़ में इंसानों को किनारे कर रही हैं? गूगल की इस छंटनी ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि टेक्नोलॉजी की इस रेस में इंसान कहां खड़ा है? और अगर AI सब कुछ कर सकता है, तो फिर उन लोगों का क्या, जिन्होंने AI को बनाने में अपनी जिंदगी का वक्त लगाया?

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