नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में दक्षिण पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन सामान्य से कम बारिश के कारण खेतों में बुवाई की रफ्तार प्रभावित हुई है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून के मध्य तक देश में वर्षा सामान्य स्तर से काफी कम रही है।रिपोर्ट के मुताबिक जून के मध्य तक कई मौसम उप-विभागों में वर्षा सामान्य से नीचे रही है, जबकि बड़ी संख्या में जिलों में कम या बहुत कम बारिश दर्ज की गई। सबसे ज्यादा असर मध्य और पूर्वी भारत के क्षेत्रों में देखा जा रहा है। यहां किसानों को बुवाई और सिंचाई दोनों में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर धान की नर्सरियां सूखने लगी हैं और नेहरों में पर्याप्त पानी न पहुंचने से धान की खेती करने वाले किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं।
खरीफ फसलों की बुवाई पर भी असर पड़ा है। दलहन और कपास जैसी फसलों का रकबा पिछले साल की तुलना में कम दर्ज किया गया है, हालांकि धान की बुवाई में कुछ बढ़ोतरी हुई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आगे की स्थिति जुलाई और अगस्त में होने वाली बारिश पर निर्भर करेगी। यदि बारिश कमजोर रही तो बुवाई का दायरा और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कम बारिश की स्थिति में किसानों को पूरी जमीन पर केवल धान जैसी पानी वाली फसलें लगाने से बचना चाहिए। इसके बजाय बाजरा और ज्वार जैसे कम पानी वाले विकल्प बेहतर हैं। मूंग और उड़द कम समय में तैयार होने वाली फसलें हैं, जबकि अरहर की गहरी जड़ें सूखे में भी अच्छा उत्पादन दे सकती हैं।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान कभी-कभी शुरुआती चरण में वर्षा कम होती है और बाद के महीनों में इसकी भरपाई हो जाती है। इसलिए आने वाले सप्ताहों की वर्षा स्थिति पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा। यदि मानसून सामान्य गति पकड़ता है, तो किसानों को राहत मिल सकती है और खरीफ सीजन में उत्पादन संबंधी चिंताओं में कमी आ सकती है।
फिलहाल देश के कई हिस्सों में किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। समय पर और पर्याप्त बारिश न केवल उनकी मेहनत को सफल बनाएगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी। आने वाले जुलाई और अगस्त के महीने यह तय करेंगे कि मौजूदा चुनौती कितनी गंभीर साबित होती है और खरीफ सीजन का अंतिम परिणाम कैसा रहता है। ऐसे समय में वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, जल संरक्षण और मौसम आधारित सलाह का पालन किसानों के लिए पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
