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जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है, भक्ति के बिना कल्याण संभव नहीं है। भक्ति का जन्म सत्संग से होता है, जहां भोग रूपी विचार सक्रिय रहते हैं वहां भक्ति नहीं होती, इसलिए मनुष्य को सदैव सत्संग करना चाहिए: कथावाचक डॉ. श्री नरेन्द्र तिवारी

मोहखेड़। चैत्र नवरात्रि पर्व में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक पंडित डॉक्टर श्री नरेन्द्र तिवारी ने शिव विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि यह पवित्र संस्कार है, लेकिन आधुनिक समय में प्राणी संस्कारों से दूर भाग रहा है। जीव के बिना शरीर निरर्थक होता है, ऐसे संस्कारों के बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं होता। भक्ति में दिखावा नहीं होना चाहिए। जब सती के विरह में भगवान शंकर की दशा दयनीय हो गई, सती ने भी संकल्प के अनुसार राजा हिमालय के घर पर्वतराज की पुत्री होने पर पार्वती के रुप में जन्म लिया। पार्वती जब बड़ी हुईं तो हिमालय को उनकी शादी की चिंता सताने लगी। एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के महल पहुंचे और पार्वती को देखकर उन्हें भगवान शिव के योग्य बताया। इसके बाद सारी प्रक्रिया शुरु तो हो गई, लेकिन शिव अब भी सती के विरह में ही रहे। ऐसे में शिव को पार्वती के प्रति अनुरक्त करने कामदेव को उनके पास भेजा गया, लेकिन वे भी शिव को विचलित नहीं कर सके और उनकी क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए।

मगर माता पार्वती जी कि भक्ति और तप के प्रताप से विवाह की वो शुभ घड़ी भी आई। भगवान शिव का विवाह पार्वती के साथ हुआ नंदी पर सवार भोलेनाथ जब भूत-पिशाचों के साथ बारात लेकर पहुंचे तो पर्वतराज और उनके परिजन अचंभित हो गए। लेकिन, माता पार्वती ने खुशी से भोलेनाथ को पति के रूप में स्वीकार कर लिया। इस दौरान पंडित तिवारी ने श्रोताओं को भोलेनाथ की बारात के दौरान हर घटने वाली हर घटना को बड़े ही विस्तार से बताया कि मनुष्य को कथा से क्या सीखना चाहिए। आपको बता दें, श्रीमद्भागवत कथा में विवाह प्रसंग के दौरान शिव-पार्वती विवाह की झांकी आकर्षण का केंद्र रही। वहीं, धार्मिक भजनों पर श्रद्धालु जमकर झूमे। इस दौरान आदि आसपास के गांव के सैकड़ों भक्त मौजूद रहे।

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