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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने निजी स्कूलों को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने निदेशालय द्वारा जारी फीस वृद्धि संबंधी कई सर्कुलरों को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभरानी ने 120 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम की धारा 17(3) के तहत स्कूलों का केवल इतना दायित्व है कि वे नए सत्र से पहले अपनी प्रस्तावित फीस का विवरण निदेशालय के पास दाखिल करें। कोर्ट ने कहा कि सत्र शुरू होने के बाद फीस बढ़ाने के लिए पूर्व अनुमति जरूरी होगी।

वित्तीय स्वायत्तता पर कोर्ट की टिप्पणी

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में निजी स्कूलों की वित्तीय स्वायत्तता पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि निजी स्कूलों को अपने प्रशासन और वित्तीय मामलों को संचालित करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। शिक्षा निदेशालय उनके वित्तीय मामलों का “माइक्रो-मैनेजमेंट” नहीं कर सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी स्कूल के पास अधिशेष फंड (Surplus Funds) होना अपने आप में व्यावसायीकरण या मुनाफाखोरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि किसी स्कूल पर अनुचित लाभ कमाने या शिक्षा के व्यवसायीकरण का आरोप लगाया जाता है, तो उसके लिए ठोस और स्पष्ट प्रमाण आवश्यक होंगे।

अदालत ने कहा कि निजी शिक्षण संस्थानों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधारभूत सुविधाएं, शिक्षकों के वेतन, तकनीकी संसाधन और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में केवल अधिशेष राशि के आधार पर किसी स्कूल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला निजी स्कूलों के लिए बड़ी राहत और अभिभावकों के लिए मिश्रित प्रतिक्रिया वाला माना जा रहा है। जहां स्कूल प्रबंधन इसे प्रशासनिक स्वतंत्रता की दिशा में सकारात्मक कदम बता रहे हैं, वहीं अभिभावक संगठन फीस वृद्धि पर निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की मांग कर रहे हैं।

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