नई दिल्ली।देश के कई हिस्सों में खरीफ सीजन शुरू हो चुका है, लेकिन अल नीनो के साए में किसान अपनी फसलों को लेकर चिंतित हैं। जून महीने में सामान्य से करीब 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे धान, मक्का, दाल और कपास की बुवाई करने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कई किसानों के मन में यही सवाल है कि क्या अल नीनो इस सीजन की पूरी मेहनत पर पानी फेर देगा।विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो का सबसे अधिक नुकसान उन इलाकों में होता है जहां खेती पूरी तरह मॉनसून पर निर्भर है। इस बार देश के लगभग 315 जिलों को संवेदनशील माना गया है, जिनमें से 111 जिलों में सिंचाई सुविधाएं बेहद कम हैं। दलहन और तिलहन जैसी फसलों के उत्पादन में सबसे ज्यादा कमी का खतरा है।
कृषि मंत्री ने आश्वासन दिया है कि हर जिले के लिए बैकअप प्लान तैयार रखा गया है, ताकि चारे और पानी की कमी न हो। जो किसान आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं या कम पानी वाले मोटे अनाज यानी मिलेट्स की खेती की ओर बढ़ रहे हैं, उन पर सूखे का प्रभाव कम रहने की उम्मीद है।एक्सपर्ट्स का कहना है कि फसलों के कम उत्पादन से आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि भारतीय कृषि अब पहले जितनी कमजोर नहीं रही, क्योंकि मजबूत सिंचाई नेटवर्क और बेहतर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध हैं। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि मौसम की सटीक जानकारी लेकर ही बुवाई करें और सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करें।
जून में सामान्य से काफी कम हुई बारिश
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जून महीने में देश के कई हिस्सों में सामान्य से लगभग 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। खरीफ फसलों की बुवाई के लिए जून का महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान खेतों में पर्याप्त नमी बनने से बुवाई का काम तेज होता है।
कम बारिश के कारण कई क्षेत्रों में किसान बुवाई टालने या वैकल्पिक फसलों पर विचार करने को मजबूर हो रहे हैं। यदि आगामी दिनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो इसका असर फसलों की शुरुआती वृद्धि पर पड़ सकता है।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक जलवायु संबंधी प्राकृतिक घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतही तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में कई बार अल नीनो की स्थिति मानसून को कमजोर कर सकती है, हालांकि हर बार इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अल नीनो के आधार पर पूरे मानसून का आकलन नहीं किया जा सकता। अन्य मौसमीय कारक भी वर्षा की स्थिति को प्रभावित करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखने और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती करने से संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही सरकार ने भी संवेदनशील क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक योजनाएं तैयार रखने की बात कही है।
अल नीनो और जून में कम हुई वर्षा ने खरीफ सीजन को लेकर किसानों की चिंता बढ़ा दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर मौसम की जानकारी, वैज्ञानिक खेती, आधुनिक सिंचाई तकनीकों और सरकारी सलाह का पालन करके संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आने वाले सप्ताहों में मानसून की स्थिति खरीफ फसलों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसलिए किसानों के लिए मौसम पर लगातार नजर रखना और परिस्थितियों के अनुसार खेती की रणनीति बनाना इस सीजन में सबसे महत्वपूर्ण रहेगा।
