नई दिल्ली। भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच हुई बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को जहां नई दिल्ली और ब्रसेल्स ऐतिहासिक करार दे रहे हैं, वहीं इस समझौते पर अमेरिका की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस डील को लेकर गहरी नाराज़गी जताते हुए इसे “बेहद निराशाजनक” बताया है। उन्होंने कहा कि यूरोप ने यह समझौता करके यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके लिए यूक्रेन के लोगों से ज्यादा व्यापारिक हित मायने रखते हैं।
इस कड़ी मे हमआपको बता दें कि, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में इस डील की आलोचना करते हुए कहा,वैसे तो हर देश और क्षेत्र को वही करना चाहिए जो उनके लिए सबसे बेहतर हो, लेकिन यूरोप के इस रवैये से मैं बेहद निराश हूं।” उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों के बीच एकजुटता की बात लगातार की जाती रही है। बेसेंट के अनुसार, यूरोप एक ओर यूक्रेन के समर्थन की बात करता है और दूसरी ओर ऐसे व्यापारिक फैसले ले रहा है जो उस संघर्ष की भावना के खिलाफ जाते हैं।
स्कॉट बेसेंट ने भारत और यूरोप के बीच हुए व्यापारिक संबंधों को यूक्रेन-रूस युद्ध से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने प्रतिबंधों के बावजूद रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। इसके बाद यूरोप ने भारत से उसी रूसी कच्चे तेल से बना रिफाइंड ऑयल खरीदना शुरू कर दिया।
अमेरिका की चिंता क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की नाराज़गी केवल इस डील तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैश्विक व्यापार संतुलन, ऊर्जा राजनीति और भू-राजनीतिक समीकरण भी हैं। अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का सख्ती से पालन हो और कोई भी देश या क्षेत्र ऐसा कदम न उठाए जिससे रूस को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचे।
भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेता है। वहीं, यूरोप भी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक दबावों के चलते व्यावहारिक रास्ता अपनाने को मजबूर रहा है।
आगे हम आपको यी भी जानकारी दे दें कि, भारत-ईयू डील पर अमेरिका की यह प्रतिक्रिया आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति और व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित कर सकती है। अमेरिका, यूरोप और भारत—तीनों ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े खिलाड़ी हैं। ऐसे में इन देशों के बीच व्यापार और राजनीति का संतुलन बेहद अहम है।कुल मिलाकर, भारत और यूरोपीय संघ जहां इस ट्रेड डील को आर्थिक विकास का बड़ा कदम बता रहे हैं, वहीं अमेरिका इसे रणनीतिक दृष्टि से गलत मान रहा है। यह विवाद आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक चर्चाओं का अहम विषय बना रह सकता है।
