इंदौर। जिसे देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, आज एक जल संकट की वजह से राष्ट्रीय सुर्खियों में है। भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित जल की आपूर्ति से अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 2000 से अधिक लोग बीमार पड़े हैं। यह त्रासदी सिर्फ एक स्वास्थ्य आपदा नहीं, बल्कि उस ‘नंबर वन’ छवि की पोल खोलती है जिसे मध्यप्रदेश ने वर्षों से प्रचारित किया है। सवाल उठता है: क्या यह सिर्फ दिखावे की सफाई थी?
जब नंबर वन का तमगा फिसड्डी साबित होता है
मध्यप्रदेश में कई बार देखा गया है कि जो चीजें ‘टॉप’ बताई जाती हैं, वे ज़मीनी हकीकत में कमजोर निकलती हैं। हाल ही में एक प्रतियोगिता परीक्षा में टॉप करने वाले कई छात्रों को प्रदेश की राजधानी तक नहीं मालूम थी। अब इंदौर की जल आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, जो देश की सबसे स्वच्छ नगर निगम के रूप में सम्मानित हो चुका है। क्या यह सम्मान सिर्फ कागज़ी था?
भगीरथपुरा की त्रासदी: लापरवाही की कीमत जान से चुकानी पड़ी
जांच में सामने आया कि सीवेज लाइन को नर्मदा जल पाइपलाइन के ऊपर बना दिया गया, जिससे गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया। इंदौर नगर निगम के तीन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि इतनी बड़ी चूक महीनों तक क्यों अनदेखी रही। आखिर प्रशासन कब तक इस मौतों के बदले मुआवजा देकर लोगों को शांत कराता रहेगा। क्या मुआवजा किसी के घऱ का चिराग वापस ला सकता है?
प्रशासनिक जवाबदेही या सिर्फ दिखावटी कार्रवाई?
मुख्यमंत्री ने जांच समिति गठित की है और कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया है। लेकिन क्या यही पर्याप्त है? पाइपलाइन की खराबी महीनों से रिपोर्ट की जा रही थी, फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक सतर्कता सिर्फ पुरस्कारों तक सीमित थी, ज़मीनी स्तर पर नहीं।
स्वच्छता के तमगे के पीछे की सच्चाई
इंदौर को लगातार ‘स्वच्छता सर्वेक्षण’ में पहला स्थान मिला है। लेकिन अगर नल से गंदा पानी आ रहा है और लोग मर रहे हैं, तो यह तमगा किस काम का? क्या स्वच्छता सिर्फ सड़कों की सफाई तक सीमित है? पेयजल की गुणवत्ता भी तो स्वच्छता का हिस्सा है। यह घटना बताती है कि ब्रांडिंग और रियलिटी में कितना अंतर है।
जनता का भरोसा टूटता है जब नंबर वन शहर में मौतें होती हैं
भगीरथपुरा के लोग अब नल का पानी पीने से डरते हैं। अस्पतालों में भीड़ है, और लोग सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं। जब जनता को यह महसूस होता है कि उनकी जान की कीमत सिर्फ आंकड़ों में गिनी जा रही है, तो भरोसा टूटता है। क्या इंदौर अब भी नंबर वन है?
राज्य की छवि पर असर: क्या अब बदलाव होगा?
मध्यप्रदेश की छवि एक उभरते राज्य की रही है, लेकिन ऐसी घटनाएं *विकास की सच्चाई को उजागर करती हैं। अगर राजधानी का नाम न जानने वाले टॉपर और गंदा पानी सप्लाई करने वाले नगर निगम साथ-साथ हैं, तो यह शिक्षा और प्रशासन दोनों की विफलता है। अब वक्त है कि नंबर वन के पीछे की सच्चाई को स्वीकार किया जाए। सारी व्यवस्थाएं रेत के महल जैसी साबित हो रही है औऱ इसमें मारा जा रहा है गरीब और आम आदमी।
सवाल तो उठेंगे, जवाब कौन देगा?
यह घटना सिर्फ इंदौर की नहीं, पूरे प्रदेश को लेकर चेतावनी है। सवाल उठेंगे कि क्या हम सिर्फ तमगे बटोरने में लगे हैं या जनता की ज़िंदगी सुधारने में भी गंभीर हैं। जब मौतें होती हैं और जवाबदेही धुंधली होती है, तो ‘नंबर वन’ का तमगा खोखला लगता है। निराशा तो तब भी होती है जब इतनी मौत की त्रासदी पर सवाल पूछे जाते हैं तो जनप्रतिनिधियों को फालतू सवाल लगता है जिम्मेदार पत्रकारों को घंटा हो गया कहकर संबोधित करते हैं तो जनता को भी सोचना पड़ेगा की उसकी औकात इनके सामने क्या है। अब ज़रूरत है जवाबदेही, पारदर्शिता और ज़मीनी सुधार की — वरना अगली त्रासदी कहीं और इंतज़ार कर रही होगी।
