पलामू: खरीफ सीजन की तैयारी में जुटे किसानों के लिए कृषि विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण सलाह दी है। बुवाई से पहले खेतों की मिट्टी का उपचार कर अच्छी उपज हासिल की जा सकती है। पलामू क्षेत्र में अधिकांश भूमि अम्लीय प्रकृति की है, जिसके कारण आवश्यक पोषक तत्व पौधों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाते।कृषि विज्ञान केंद्र, चियांकी (पलामू) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दिलीप पांडे ने बताया कि अम्लीय मिट्टी में चूने का उपयोग प्रभावी उपाय है। इससे मिट्टी का पीएच स्तर 6 से 7 के बीच संतुलित हो जाता है, जो अधिकांश फसलों के लिए आदर्श माना जाता है। मक्का और अरहर जैसी खरीफ फसलों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है।
पलामू क्षेत्र की मिट्टी में है अम्लीयता की समस्या
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पलामू और आसपास के कई इलाकों में मिट्टी का पीएच स्तर सामान्य से कम पाया जाता है। ऐसी मिट्टी को अम्लीय मिट्टी कहा जाता है। अम्लीय मिट्टी में पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाते, जिससे फसलों का विकास प्रभावित होता है।
जब मिट्टी अत्यधिक अम्लीय हो जाती है तो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का अवशोषण पौधों द्वारा सही ढंग से नहीं हो पाता। इसके परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि धीमी पड़ जाती है और उत्पादन में कमी आने लगती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते मिट्टी की इस समस्या का समाधान कर लिया जाए तो किसानों को बेहतर उपज प्राप्त हो सकती है और खेती की लागत के मुकाबले अधिक लाभ मिल सकता है।
चूना मिट्टी का पीएच स्तर करता है संतुलित
कृषि विज्ञान केंद्र, चियांकी (पलामू) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दिलीप पांडे ने बताया कि अम्लीय मिट्टी के सुधार के लिए चूने का प्रयोग एक प्रभावी और वैज्ञानिक तरीका है। चूना मिट्टी की अम्लीयता को कम करने में मदद करता है और पीएच स्तर को संतुलित बनाता है।
उन्होंने बताया कि अधिकांश फसलों के लिए मिट्टी का आदर्श पीएच स्तर 6 से 7 के बीच माना जाता है। जब मिट्टी इस स्तर पर पहुंचती है तो पौधों को आवश्यक पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध होने लगते हैं। इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं, वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है।
खरीफ सीजन से पहले खेतों की सही तैयारी किसानों की सफलता की कुंजी है। पलामू क्षेत्र सहित अम्लीय मिट्टी वाले इलाकों के किसानों के लिए चूने का प्रयोग एक सरल, सस्ता और प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार बुवाई से 40 से 45 दिन पहले उचित मात्रा में बुझा हुआ चूना खेत में डालकर मिट्टी का पीएच संतुलित किया जा सकता है। इससे मक्का, अरहर और अन्य खरीफ फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकेगा।
