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तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव (KLIBF) के चौथे संस्करण में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के योगदान और गलतियों पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। तिरुवनंतपुरम से सांसद थरूर ने नेहरू को भारतीय लोकतंत्र का संस्थापक बताते हुए कहा कि वे नेहरू के विचारों और दृष्टिकोण के बड़े प्रशंसक हैं, लेकिन अंधभक्त नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेहरू की गलतियों को स्वीकार करना आवश्यक है, लेकिन देश की हर समस्या के लिए उन्हें अकेले दोषी ठहराना अनुचित और गलत है।

थरूर ने कहा, “मैं जवाहरलाल नेहरू का प्रशंसक हूं, लेकिन बिना सोचे-समझे उनका प्रशंसक नहीं हूं। मैं उनके विचारों और दृष्टिकोण की बहुत प्रशंसा करता हूं और उनके प्रति गहरा सम्मान रखता हूं। हालांकि, मैं उनके सभी विचारों और नीतियों का शत-प्रतिशत समर्थन नहीं कर सकता। उन्होंने कई ऐसे कार्य किए हैं जो अत्यंत प्रशंसा के पात्र हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेहरू ने ही भारत में लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी।”

गौरतलब हैं कि, यह बयान 8 जनवरी 2026 को तिरुवनंतपुरम में आयोजित KLIBF के दौरान दिया गया, जहां थरूर ने नेहरू की विरासत पर चर्चा की। उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “मैं यह नहीं कहूंगा कि मोदी सरकार लोकतंत्र विरोधी है, लेकिन वे निश्चित रूप से नेहरू विरोधी हैं। नेहरू को एक सुविधाजनक बलि का बकरा बना दिया गया है।” थरूर का यह कथन राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे नेहरू की आलोचना को उचित ठहराते हुए भी भाजपा की नीति पर सवाल उठाते हैं कि वे हर मुद्दे पर नेहरू को दोषी ठहरा देते हैं, चाहे वह किसी भी संदर्भ में हो।

बता दें कि, शशि थरूर ने नेहरू को भारतीय लोकतंत्र का मजबूत आधार देने वाला नेता बताया। नेहरू के कार्यकाल में स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी भारत की पहचान हैं। थरूर के अनुसार, नेहरू ने स्वतंत्र भारत को एक आधुनिक, समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे नेहरू को ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतंत्र को मजबूत किया।

आने वाले समय में ऐसे बयान राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे सकते हैं। नेहरू की विरासत पर बहस जारी रहेगी, लेकिन थरूर जैसे नेता इसे संतुलित रखने की कोशिश कर रहे हैं। यह बयान न केवल नेहरू की भूमिका को रेखांकित करता है, बल्कि राजनीतिक आलोचना में संयम और तर्क की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है।

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