नई दिल्ली। बीजेपी के पूर्व प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने 17 अगस्त 2026 को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने देश की सभी सरकारों से मिडिल क्लास के टैक्स और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए हैं। अपने एक्स अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का मिडिल क्लास दिन दहाड़े लूटा जा रहा है और वह एटीएम बन चुका है। उन्होंने पूछा कि क्या मिडिल क्लास जितना टैक्स देता है, उसी अनुपात में उसे सुविधाएं मिलती हैं।
पूनावाला ने देश के स्कूलिंग और हेल्थ सिस्टम पर भी सवाल किए। उन्होंने कहा कि परिवारों को बच्चों की पढ़ाई के लिए अक्सर प्राइवेट स्कूलों और माता-पिता के इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। उनके शब्दों में, “जब आपको अपने बच्चे को स्कूल भेजना होता है, तो वह हमेशा प्राइवेट स्कूल ही होता है। जब आपको अपने माता-पिता को अस्पताल भेजना होता है, तो वह हमेशा प्राइवेट अस्पताल ही होता है।”
जानकारी देते चले कि, 18 अगस्त को एक्स पर उन्होंने फिर लिखा कि मिडिल क्लास सभी सरकारों से यह सवाल पूछ रहा है कि अगर हम ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से टैक्स देते हैं, तो क्या हमें ग्लोबल स्टैंडर्ड की सुविधाएं मिलती हैं, जैसे सरकारी स्कूल, सड़कें, सांस लेने के लिए साफ हवा और पीने का साफ पानी। उन्होंने पर्सनल इनकम टैक्स, जीएसटी, टोल, सेस, फ्यूल टैक्स और लोकल टैक्स का जिक्र करते हुए कहा कि इतना सब देने के बाद बदले में क्या मिल रहा है। पूनावाला ने कहा कि योगदान देने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन भारत का मिडिल क्लास सिंगापुर जैसी व्यवस्था क्यों नहीं पा सकता, जिसमें कम टैक्स, बेहतर सड़कें, बेहतर ट्रांसपोर्ट और बेहतर सिविक इंफ्रास्ट्रक्चर हो। उन्होंने हर अथॉरिटी से वसूले गए एक-एक रुपये की जवाबदेही मांगी और सैलरी पाने वाले मिडिल क्लास के लिए टैक्स कम करने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वर्ल्ड-क्लास सुविधाएं नहीं मिलतीं, तब तक सैलरी पाने वाले मिडिल क्लास के लिए पर्सनल इनकम टैक्स खत्म करने का समय आ गया है।
टैक्स के बदले सुविधाओं पर उठाया सवाल
पूनावाला ने अपने वीडियो में सवाल किया कि मिडिल क्लास जितना टैक्स देता है, क्या उसे उसी अनुपात में सुविधाएं मिलती हैं? उन्होंने खास तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था का उदाहरण दिया।
उनका कहना था कि जब किसी परिवार को अपने बच्चों की पढ़ाई की जरूरत होती है तो वह अक्सर प्राइवेट स्कूलों का रुख करता है। इसी तरह माता-पिता के इलाज के लिए भी कई परिवार निजी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकारी स्कूल और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था मौजूद हैं, तो बड़ी संख्या में परिवारों को अपनी आय का अतिरिक्त हिस्सा निजी सेवाओं पर क्यों खर्च करना पड़ता है?
यह सवाल केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। भारत में मध्यम वर्ग के परिवारों के बजट में घर, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, ईंधन और अन्य जरूरी खर्चों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में टैक्स के साथ-साथ निजी सेवाओं का खर्च बढ़ने पर परिवारों के सामने वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
बीजेपी छोड़ने के बाद शहजाद पूनावाला के इन बयानों ने मिडिल क्लास, टैक्स और सरकारी सुविधाओं को लेकर राजनीतिक चर्चा को नया संदर्भ दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि टैक्स देने में समस्या नहीं है, लेकिन उसके बदले बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं और जवाबदेही जरूरी है।
उनकी मांग खास तौर पर नौकरीपेशा मिडिल क्लास के लिए व्यक्तिगत आयकर को लेकर है। आने वाले समय में यह मुद्दा टैक्स सुधार, सार्वजनिक खर्च, शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी बहस में कितना स्थान बनाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल पूनावाला के सवाल का केंद्र यही है कि अगर मध्यम वर्ग देश की अर्थव्यवस्था और सरकारी राजस्व में लगातार योगदान देता है, तो उसे बेहतर स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़कें, परिवहन, स्वच्छ हवा और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं कब और किस स्तर पर मिलेंगी।
