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समाचार मिर्ची

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर खत्म होने और जंग शुरू होने से भारत के लिए कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। डोनाल्ड ट्रंप के ऐलान के बाद ग्लोबल टेंशन बढ़ गया है। अमेरिका ने ईरान के 90 ठिकानों को निशाना बनाया है, जिससे होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट का खतरा बढ़ गया है।

पहली टेंशन तेल-गैस सप्लाई को लेकर है। होर्मुज स्ट्रेट से भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 प्रतिशत और एलएनजी का करीब 60 प्रतिशत आता है। पहले के संघर्ष में रुकावट से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम बढ़े थे। दूसरी टेंशन आयात बिल बढ़ने की है। भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल जरूरत आयात करता है। होर्मुज में समस्या से क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ने पर आयात बिल बढ़ेगा और रुपया दबाव में आ सकता है।

तीसरी टेंशन पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद कम होने की है। पहले के युद्ध में ईंधन कीमतों में चार बार करीब 7 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। चौथी टेंशन महंगाई बढ़ने की है, क्योंकि तेल महंगा होने से आयातित सामान प्रभावित होंगे। पांचवीं टेंशन शेयर बाजार पर है। ट्रंप के बयान के बाद बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में भूचाल आया और क्रैश हो गया।

प्वाइंट में जानें भारत को कहां क्या नुकसान-

1. तेल और गैस की आपूर्ति पर असर

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल और एलएनजी (Liquefied Natural Gas) का एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

2. आयात बिल बढ़ने की आशंका

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश का आयात बिल भी बढ़ सकता है।

आयात पर अधिक खर्च होने से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है, जिसका असर रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है। यदि रुपया कमजोर होता है, तो अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इससे सरकार, उद्योग और उपभोक्ताओं—तीनों पर आर्थिक दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।

3. पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों पर दबाव

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव ईंधन की लागत पर पड़ता है। हालांकि भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की खुदरा कीमतें कई कारकों—जैसे अंतरराष्ट्रीय कीमतें, कर, विपणन कंपनियों की लागत और सरकारी नीतियों—पर निर्भर करती हैं, फिर भी लंबे समय तक महंगा क्रूड रहने पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

4. महंगाई बढ़ने का खतरा

ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का प्रभाव केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्यान्न, उपभोक्ता वस्तुओं, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।

इसके अलावा कई उद्योग उत्पादन के लिए ऊर्जा पर निर्भर रहते हैं। यदि ऊर्जा महंगी होती है, तो उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। इसलिए लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें बनी रहने पर खुदरा और थोक महंगाई दोनों में वृद्धि की आशंका बढ़ सकती है।

5. शेयर बाजार में बढ़ सकती है अस्थिरता

भूराजनीतिक तनाव का असर अक्सर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी देखने को मिलता है। निवेशक अनिश्चित परिस्थितियों में जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाकर अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। इसका प्रभाव शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव के रूप में दिखाई दे सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। देश अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार विकसित करने और नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने पर भी लगातार काम कर रहा है।

बताते चले कि, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव भारत के लिए कई आर्थिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। तेल और गैस की आपूर्ति, आयात बिल, ईंधन की कीमतें, महंगाई और शेयर बाजार जैसे क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव को लेकर विशेषज्ञ लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि वास्तविक असर संघर्ष की अवधि, वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया और भारत द्वारा उठाए जाने वाले नीतिगत कदमों पर निर्भर करेगा। ऐसे समय में ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्थाएं भारत के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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