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नई दिल्ली। भारत के पास भूकंप की सटीक भविष्यवाणी की कोई वैज्ञानिक तकनीक नहीं है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में भूकंपीय निगरानी नेटवर्क और क्षेत्रीय पूर्व चेतावनी प्रणालियां विकसित की गई हैं। ये प्रणालियां भूकंप शुरू होने के तुरंत बाद खतरनाक झटकों से कुछ सेकंड पहले लोगों को अलर्ट कर सकती हैं। आईआईटी रुड़की ने उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर भूदेव नाम का अत्याधुनिक भूकंप पूर्व चेतावनी ऐप विकसित किया है। यह ऐप आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर भूकंप के खतरों से निपटने और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

सरकार ने संसद को बताया था कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में रियल-टाइम भूकंपीय नेटवर्क शुरू किया गया है। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी क्षेत्रीय डेटा का उपयोग करके प्रोटोटाइप ईईडब्ल्यू एल्गोरिदम विकसित और परीक्षण कर रहा है, जिससे पी-वेव की सटीक पहचान और भूकंप की तीव्रता का तेज अनुमान लगाया जा सकेगा। भूकंप आने पर सबसे पहले पी-वेव्स निकलती हैं, जो तेज यात्रा करती हैं और कम नुकसान पहुंचाती हैं। सिस्टम एपिसेंटर के पास इन तरंगों को पकड़ लेता है और विनाशकारी तरंगों के पहुंचने से पहले दूर के इलाकों में अलर्ट भेज देता है। चेतावनी का समय भूकंप केंद्र से दूरी पर निर्भर करता है।

कैसे काम करता है अर्ली वार्निंग सिस्टम?

भूकंप के दौरान सबसे पहले पी-वेव (Primary Wave) निकलती है। यह तरंग सबसे तेज गति से यात्रा करती है, लेकिन आमतौर पर ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती। इसके बाद आने वाली एस-वेव (Secondary Wave) और सतही तरंगें अधिक विनाशकारी होती हैं और भवनों, सड़कों तथा अन्य संरचनाओं को गंभीर क्षति पहुंचा सकती हैं।

अर्ली वार्निंग सिस्टम का मुख्य उद्देश्य यही है कि जैसे ही एपिसेंटर के पास लगे संवेदनशील सेंसर पी-वेव को पहचानें, उसी समय कंप्यूटर सिस्टम भूकंप की तीव्रता और संभावित प्रभाव का तेज़ी से आकलन करे। इसके बाद दूर स्थित क्षेत्रों में मोबाइल ऐप, सायरन या अन्य डिजिटल माध्यमों से कुछ सेकंड पहले चेतावनी भेजी जाती है। यही कुछ सेकंड लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने, बिजली और गैस जैसी सेवाएं बंद करने या आवश्यक सावधानी बरतने का अवसर दे सकते हैं।

चेतावनी का समय दूरी पर निर्भर

विशेषज्ञों के अनुसार, अर्ली वार्निंग सिस्टम हर स्थान पर समान समय नहीं दे सकता। चेतावनी मिलने का समय इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित क्षेत्र भूकंप के केंद्र यानी एपिसेंटर से कितनी दूरी पर स्थित है।

यदि कोई शहर एपिसेंटर से काफी दूर है, तो वहां लोगों को 10 से 30 सेकंड या उससे अधिक समय पहले अलर्ट मिल सकता है। वहीं यदि कोई क्षेत्र भूकंप के केंद्र के बहुत करीब है, तो चेतावनी का समय बेहद कम या लगभग न के बराबर हो सकता है। इसलिए इस तकनीक का उद्देश्य भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि तेज़ी से सूचना देकर नुकसान को कम करना है।

भारत में भूकंप की सटीक भविष्यवाणी फिलहाल संभव नहीं है, लेकिन अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम भूकंपीय निगरानी नेटवर्क जैसी आधुनिक तकनीकें आपदा प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती हैं। उत्तराखंड में विकसित ‘भूदेव’ ऐप और हिमालयी राज्यों में स्थापित निगरानी तंत्र भविष्य में लाखों लोगों की सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन प्रणालियों का लगातार विस्तार किया जाता है और लोगों में इनके प्रति जागरूकता बढ़ाई जाती है, तो भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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