समाचार मिर्ची

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अमेरिका में जेफरी एपस्टीन से जुड़े कांड ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं, और इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम प्रमुखता से उछला है। 5 फरवरी 2026 को अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन फाइल्स के एक बड़े हिस्से को सार्वजनिक किया, लेकिन इसके तुरंत बाद दस्तावेजों की वेबसाइट अचानक डाउन हो गई। इस घटना ने साजिश की अफवाहों को हवा दी, और सोशल मीडिया पर आरोप लगाए जाने लगे कि क्या सच्चाई को छुपाया जा रहा है? न्याय विभाग ने इसे महज तकनीकी खराबी बताया है, लेकिन विपक्षी नेता और जनता में संदेह गहरा रहा है। आइए इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल करें।

न्याय विभाग के अनुसार, कुल 60 लाख से अधिक पन्नों को संभावित रूप से प्रासंगिक माना गया था। इनमें एफबीआई और न्याय विभाग के ईमेल, इंटरव्यू रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट, तस्वीरें, वीडियो और एपस्टीन के निजी डिवाइस से जब्त किया गया डिजिटल डेटा शामिल है। इन दस्तावेजों में बड़ी मात्रा में अश्लील सामग्री भी है, जो एपस्टीन के कंप्यूटर, फोन और अन्य उपकरणों से बरामद की गई। जांच के बाद करीब 35 लाख पन्ने जारी किए गए हैं। बाकी फाइलें इसलिए रोकी गई हैं क्योंकि वे चल रही जांचों से जुड़ी हैं, पीड़ितों की निजता की रक्षा के लिए हैं या मेडिकल रिकॉर्ड से संबंधित हैं। न्याय विभाग ने कहा है कि इनमें से कुछ सामग्री इतनी संवेदनशील है कि सार्वजनिक करने से पीड़ितों को और नुकसान पहुंच सकता है।

जानकारी दे दें कि, इन जारी की गई फाइल्स में डोनाल्ड ट्रंप का नाम सैकड़ों बार आया है। ट्रंप पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें एपस्टीन के साथ उनके संबंध, पार्टियों में भागीदारी और कुछ पीड़ितों के बयानों में उनका जिक्र शामिल है। एक पीड़ित के इंटरव्यू में कहा गया है कि ट्रंप एपस्टीन के पाम बीच वाले घर पर अक्सर आते थे और वहां की गतिविधियों में शामिल थे। हालांकि, न्याय विभाग और व्हाइट हाउस दोनों ने साफ किया है कि इनमें शामिल कई आरोप अप्रमाणित हैं। ट्रंप के प्रवक्ता ने इसे “फेक न्यूज” और राजनीतिक साजिश बताया है। ट्रंप खुद ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर कहा कि एपस्टीन से उनका कोई गहरा संबंध नहीं था और वे सिर्फ सामाजिक मुलाकातें थीं। लेकिन फाइल्स में कुछ ईमेल और फोटोज से ट्रंप की एपस्टीन के साथ निकटता साफ झलकती है।

इस कड़ी में डिप्टी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस पर सफाई दी। उन्होंने स्वीकार किया कि इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेजों की समीक्षा में गलतियां हो सकती हैं। ब्लांश ने कहा, “यदि किसी रेडैक्शन में चूक हुई है तो उसे तुरंत सुधारा जाएगा। हम पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन पीड़ितों की सुरक्षा सर्वोपरि है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई साजिश नहीं है और वेबसाइट डाउन होना महज तकनीकी समस्या थी। लेकिन विपक्षी डेमोक्रेट्स ने इसे गंभीरता से लिया। सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने कहा कि न्याय विभाग ट्रंप प्रशासन के दबाव में काम कर रहा है और पूरी सच्चाई सामने नहीं आ रही।

चलते चलते बता दें कि, इस मामले ने अमेरिकी न्याय प्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। 35 लाख पन्नों की समीक्षा में कितनी पारदर्शिता बरती गई? रेडैक्टेड हिस्सों में क्या छुपा है? पीड़ितों की वकील सारा रैनसम ने कहा कि फाइल्स जारी होना अच्छा है, लेकिन पूरी सच्चाई अभी भी छुपी है। उन्होंने मांग की कि सभी दस्तावेज बिना सेंसर के जारी किए जाएं।

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