आज जब रघु राय सर के इस दुनिया से विदा होने की खबर मिली, तो आँखों के सामने स्मृतियों का एक पूरा चलचित्र घूम गया। यह सिर्फ एक महान फोटोग्राफर के जाने की खबर नहीं है, बल्कि मेरे जैसे एक शोधार्थी के लिए उस जीवित ग्रंथ के खो जाने जैसा है, जिससे मैंने ‘देखना’ सीखा। मेरी यह यात्रा साल 2016 में शुरू हुई थी, जो आज एक दशक का सफर तय कर चुकी है।
साल 2016 में जब मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एम.फिल (M.Phil) का छात्र था, तब पहली बार रघु राय सर का नाम मेरे कानों में पड़ा। मेरे तत्कालीन विभागाध्यक्ष, प्रो. अनिल राय ‘अंकित’ सर ने मेरी फोटोग्राफी के प्रति रुचि को देखते हुए एक सुझाव दिया। उन्होंने कहा, “अमित, तुम अपने शोध का विषय ‘रघु राय की फोटो पत्रकारिता’ क्यों नहीं चुनते?” उस समय मैं सिर्फ तस्वीरें खींचता था, लेकिन अंकित सर की उस एक सलाह ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी।
रघु राय-एक ऐसा नाम जो उस समय मेरे लिए एक रहस्यमयी महासागर जैसा था। मैंने उनके काम को पढ़ना शुरू किया और यहीं से तस्वीरों के माध्यम से समाज को देखने, सुनने और महसूस करने की मेरी दृष्टि विकसित हुई। शोध के प्रति मेरी गंभीरता का आलम यह था कि उनसे मिलने के लिए मैंने जो प्रश्नावली तैयार की थी, उसे विश्वविद्यालय के पाँच अलग-अलग प्रोफेसरों से जांच करवाया था। मैं एक ऐसी महान शख्सियत के सामने जा रहा था जिसने भोपाल गैस त्रासदी से लेकर बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक को अपनी आँखों से देखा था, इसलिए मैं कोई चूक नहीं करना चाहता था।
एम.फिल के बाद मैंने इस विषय को और विस्तार देने का निर्णय लिया। मैंने वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय (VBSPU), जौनपुर के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग से डॉ. सुनील कुमार, सहायक आचार्य के निर्देशन में अपनी पीएचडी (Ph.D.) शुरू की। मेरा विषय था “सामाजिक यथार्थ का प्रस्तुतीकरण और समकालीन फ़ोटो पत्रकारिता (रघु राय की फोटोपत्रकारिता के विषय के विशेष संदर्भ में)”।
शुरुआत में, जब मैंने 2016 में रघु सर के बारे में जाना था, तो मन में एक मानवीय धारणा थी। मुझे लगा था कि उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं रही होगी। पिता रेलवे में सरकारी अधिकारी थे, उनके बड़े भाई एस. पॉल जी एक दिग्गज फोटोग्राफर थे और उन्हें बड़े लोगों का साथ मिला, इसलिए वे सफल हो गए। मुझे लगा कि शायद एक प्रभावशाली पृष्ठभूमि ने उन्हें मौका दिया और उनकी तस्वीरें अखबारों में तुरंत छपने लगीं।
लेकिन साल 2023 में जब मुझे उनके सानिध्य में एक महीने की इंटर्नशिप करने का मौका मिला, तो मेरे ये सारे भ्रम टूट गए। अमित चौहान सर की मदद से जब मैंने उनके दैनिक कार्य को करीब से देखा, तब समझ आया कि इस सफलता के पीछे कितनी कड़ी तपस्या और समर्पण है। उन्होंने संसाधनों का उपयोग नहीं किया, बल्कि संसाधनों को अपनी दृष्टि से सार्थक बनाया। मैंने देखा कि वे जिस भी संस्थान में रहे, उन्होंने लाखों तस्वीरें लीं। उनके आर्काइव में आज भी कारगिल युद्ध, बांग्लादेश विभाजन और भोपाल गैस त्रासदी की ऐसी अनगिनत तस्वीरें दफन हैं, जो कभी दुनिया के सामने आई ही नहीं। उनका पूरा जीवन एक तपस्वी की तरह रहा है, जिसने अपनी कला के लिए हर सुख का त्याग किया।
एक बार मैंने उनसे पूछा, “सर, जब आप कैमरा आँखों पर लगाते हैं, तो एक परफेक्ट फ्रेम में आप क्या ढूंढते हैं?” वे मुस्कुराए और बोले, “इमोशन (भावना)”। उनका दर्शन बहुत स्पष्ट था कैमरा कितना भी महँगा या सस्ता हो, वह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि आपके भीतर के इमोशन कितने ‘महँगे’ हैं। वे अक्सर कहते थे, “मुन्ना, अच्छी तस्वीरें लेने के लिए तुम्हें अच्छा देखना पड़ेगा, और तुम अच्छा तभी देख पाओगे जब तुम पढ़ोगे।” उनका मानना था कि एक फोटोग्राफर को सिर्फ कैमरे की तकनीक नहीं, बल्कि दुनिया के महान कलाकारों और फोटोग्राफरों के काम को पढ़ना चाहिए। वे रंगीन दुनिया के बीच ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ (काली और सफेद) फोटोग्राफी के मुरीद थे। उनका तर्क था कि शायद ये रंगहीन तस्वीरें ही हैं जो इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं करतीं। उम्र के 75वें पड़ाव को पार करने के बाद भी उनमें वह ऊर्जा थी, जो एक युवा शोधार्थी के तौर पर मुझे प्रेरित करती थी।
