नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बगावत तेज हो गई है। विधायकों और सांसदों के साथ-साथ पार्टी दफ्तर और अब बैंक खाते भी उनके नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं।पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी का सियासी किला ढह गया है। 1998 में खुद स्थापित की गई पार्टी दो महीनों में ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है। टीएमसी के 80 विधायकों में से करीब 64 ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट के साथ हैं, जबकि 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर लिया है।
बागी गुट ने कोलकाता में बैठक कर ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया और अरूप रॉय को नया अध्यक्ष बनाया। अभिषेक बनर्जी को ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी पद से सस्पेंड कर दिया गया। बागी नेताओं ने पार्टी दफ्तर पर कब्जा कर लिया और ममता की तस्वीरें हटा दीं।
aajtak.inपार्टी और पद छिनने के बाद अब आर्थिक मोर्चे पर भी झटका लगा है। बागी गुट की शिकायत पर ईडी और बिधाननगर पुलिस की कार्रवाई में TMC के तीन मुख्य बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिनमें करीब 440 करोड़ रुपये जमा थे। आरोप मनी लॉन्ड्रिंग का है।
बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी के कई विधायक और सांसद नेतृत्व से असंतुष्ट हो गए। रिपोर्टों के मुताबिक, बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों ने बागी गुट का समर्थन किया है। इसी घटनाक्रम के बीच यह दावा भी किया गया है कि लोकसभा के कई सांसदों ने पार्टी छोड़कर दूसरे राजनीतिक मंच का रुख कर लिया है। हालांकि, ऐसे सभी दावों पर संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और चुनाव आयोग अथवा अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति भी महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र बिंदु तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक घटनाक्रम बना हुआ है। पार्टी के संगठन, नेतृत्व और भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, इन सभी घटनाक्रमों के बीच अंतिम स्थिति आधिकारिक घोषणाओं, कानूनी प्रक्रियाओं और संबंधित संस्थाओं के निर्णयों के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस संकट से उबर पाती है या पश्चिम बंगाल की राजनीति में किसी नए राजनीतिक समीकरण का रास्ता तैयार होता है।
